UP Assembly Election 2027: सर्वे में NDA और INDIA में कांटे की टक्कर, आरक्षण और जातिगत राजनीति में फंस रही BJP

UP Assembly Election 2027

UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश में साल 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सूबे का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। राज्य में आरक्षण, संविधान और जातिगत समीकरणों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी बेहद तेज हो गई है। हाल ही में उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की आरक्षण विरोधी युवाओं के साथ बातचीत और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राहुल गांधी के मनुस्मृति संबंधी बयान पर साध गए निशाने के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने कोर वोटर बेस को लेकर आशंकित है। इस बीच आए एक नए जनमत सर्वेक्षण ने राज्य में महामुकाबले की तस्वीर साफ कर दी है।

वोट वाइब सर्वे में 0.1% का अंतर, कांटे का मुकाबला

वोट वाइब (Vote Vibe) के ताजा स्टेट वाइब सर्वे के आंकड़ों ने राज्य की चुनावी हवा का मिजाज उजागर कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक 2027 की चुनावी जंग बेहद करीबी होने जा रही है।

सर्वे में जहां 41.1 फीसदी जनता का मानना है कि बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) गठबंधन राज्य में अपनी सत्ता बरकरार रखेगा, वहीं 41.2 फीसदी लोगों ने अखिलेश यादव की अगुवाई वाले इंडी गठबंधन पर अपना भरोसा जताया है। महज 0.1% के अंतर ने दोनों गठबंधनों के बीच बेहद कड़े मुकाबले के संकेत दे दिए हैं।

आरक्षण और मनुस्मृति विवाद पर बीजेपी-विपक्ष आमने-सामने

आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ चल रहे कुछ अभियानों के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मोर्चा संभालते हुए राहुल गांधी पर सीधा हमला बोला। सीएम योगी ने कहा कि राहुल गांधी को मनुस्मृति पर टिप्पणी करने से पहले देश की महान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को समझना चाहिए।

दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस ने आरक्षण, संविधान और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सत्तारूढ़ बीजेपी से अपना रुख पूरी तरह साफ करने की मांग की है।

2024 के नतीजों ने बढ़ाई बीजेपी की रणनीतिक चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में संविधान और आरक्षण ही सबसे बड़े निर्णायक मुद्दे साबित हुए थे। उन चुनावों में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी का प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा, जबकि अखिलेश यादव की सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर परचम लहराया था।

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विपक्षी गठबंधन ने दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अति-पिछड़े और अल्पसंख्यक (PDA) मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है। ऐसे में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं (करीब 20%) को साधे रखते हुए पिछड़े और दलित वर्ग के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

दलित वोटों पर टिकी सभी की निगाहें

मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी अपने कैडर और दलित जनाधार को मजबूत करने में पूरी ताकत से जुट गई है। बसपा ने हाल ही में स्पष्ट ऐलान किया है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में बिना किसी गठबंधन के अकेले लड़ेगी। दलित मतदाताओं के बीच बसपा का वोट शेयर बीजेपी और सपा दोनों ही बड़े सियासी धड़ों के जीत-हार का गणित बिगाड़ सकता है।

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