लचार शिक्षा व्यवस्था: पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक उत्तरदायित्व की चुनौती

भारतीय संविधान शिक्षा को प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार घोषित करते हुए राज्य पर यह संवैधानिक दायित्व अधिरोपित करता है कि वह देश के प्रत्येक बच्चे एवं युवा के लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करे, जो गुणवत्तापूर्ण, समावेशी, पारदर्शी तथा समान अवसरों पर आधारित हो। शिक्षा व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास के साथ जागरूक, सक्षम और उत्तरदायी नागरिकों का निर्माण करती है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के साथ राष्ट्र के विकास में सक्रिय योगदान देते हैं और आत्मनिर्भर, समावेशी और विकसित भारत के निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए विश्वविख्यात नेता नेल्सन मंडेला ने कहा है, “शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं।” इसी प्रकार भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार एवं महान समाज सुधारक डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और आत्मसम्मान का आधार मानते हुए संदेश दिया, “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के अनुसार शिक्षा केवल आजीविका प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन, विचारों और चरित्र निर्माण का माध्यम है।
वहीं रवीन्द्रनाथ ठाकुर शिक्षा को स्वतंत्र चिंतन, सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों के विकास का साधन माना हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने विकास को केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मानव क्षमताओं के विस्तार के रूप में देखा है। इन विचारों से स्पष्ट है कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होती है। एवं शिक्षा पर किया गया निवेश वास्तव में राष्ट्र के भविष्य में किया गया निवेश है।
जब शिक्षा व्यवस्था अपनी मूल भावना से दूर होकर गुणवत्ता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे मूल सिद्धांतों से समझौता करने लगती है तथा परीक्षा प्रणाली में अनियमितताएँ, प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएँ, भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार एवं कुप्रबंधन जैसी समस्याएँ सामने आती हैं तथा इसके साथ ही शिक्षा का बढ़ते व्यवसायीकरण के कारण भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता पर निर्भर होती जा रही है, जिसके कारण गरीब और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों के लिए समान अवसर प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है।

जब कोई गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के सपने को साकार करने के लिए अपनी जीवनभर की बचत लगाता है, ऋण लेता है या अपनी जमीन और खेती-बाड़ी तक बेचने को मजबूर होता है, तो वह केवल शिक्षा में निवेश नहीं करता, बल्कि अपने बच्चों के सपनों, संघर्षों और बेहतर जीवन की आशाओं में विश्वास करता है। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक, भ्रष्टाचार और नौकरी दिलाने के नाम पर चलने वाले अनैतिक गोरखधंधे इन परिवारों के वर्षों के परिश्रम और उम्मीदों को गहरा आघात पहुँचाते हैं।
जब एक युवा पूरी मेहनत, लगन और विश्वास के साथ परीक्षा की तैयारी करता है, लेकिन व्यवस्था की खामियों, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के कारण उसका भविष्य अनिश्चित हो जाता है, तो इसका प्रभाव केवल उसकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार की आशाओं को प्रभावित करता है। अत्यधिक मानसिक दबाव और निराशा की स्थिति में कुछ युवाओं द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम समाज और शासन व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसी क्षति की कोई वास्तविक भरपाई संभव नहीं होती।
ये घटनाएँ न केवल पीड़ित परिवारों को गहरा आघात पहुँचाती हैं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनता के विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। लाचार और अव्यवस्थित शिक्षा व्यवस्था में सुधार की इसी आवश्यकता की परिणति के रूप में नीट पेपर लीक आंदोलन को देखा जा सकता है। इस आंदोलन में केवल विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में उनके माता-पिता भी शामिल हो रहे हैं, विशेष रूप से वे परिवार, जिन्होंने प्रश्नपत्र लीक या परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के कारण अपने बच्चों को खो दिया है, उनकी पीड़ा को अत्यंत संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ समझने की आवश्यकता है।
छोटे-छोटे बच्चे और उनके अभिभावक जब न्याय, पारदर्शिता और निष्पक्ष व्यवस्था की मांग को लेकर आवाज उठाते हैं, तो यह केवल एक विरोध नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास और जवाबदेही की पुनर्स्थापना की मांग होती है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार और संबंधित संस्थाओं का दायित्व है कि वे इस विषय को पूरी संवेदनशीलता, गंभीरता और मानवीय दृष्टिकोण के साथ लें तथा शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार सुनिश्चित करें।
लंबे समय से शिक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत विषयों को राजनीतिक विमर्श में वह स्थान और प्राथमिकता प्राप्त नहीं हो सकी है, जिसकी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक एवं विकासशील राष्ट्र से की जाती है। ये विषय केवल नीतिगत मुद्दे नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य, सामाजिक न्याय और मानव संसाधन के निर्माण से सीधे जुड़े हुए हैं। दुर्भाग्यवश, कई बार राजनीतिक विमर्श तात्कालिक और भावनात्मक मुद्दों तक सीमित रह जाता है, जबकि शिक्षा और रोजगार जैसे दूरगामी प्रभाव वाले विषय अपेक्षित गंभीरता और निरंतरता के साथ चर्चा का केंद्र नहीं बन पाते।
इसका परिणाम यह होता है कि शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियाँ, युवाओं की बढ़ती आकांक्षाएँ और रोजगार से जुड़ी चुनौतियाँ लंबे समय तक समाधान की प्रतीक्षा करती रहती हैं। कई बार तात्कालिक और भावनात्मक मुद्दे राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर अधिक प्रभावी हो जाते हैं। नीट पेपर लीक आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता, परीक्षा की विश्वसनीयता और अवसरों की समानता जैसे प्रश्नों को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाने का कार्य किया है।
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अतः नीट पेपर लीक जैसे आंदोलनों को केवल असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार और नीति-निर्माताओं का दायित्व है कि वे परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाएं, अनियमितताओं पर प्रभावी कार्रवाई करें तथा ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी को निष्पक्ष अवसर प्राप्त हो।
अंतत: यह कहा जा सकता हैं कि यदि भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो शिक्षा को केवल प्रशासनिक विषय या चुनावी घोषणा तक सीमित न रखकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। क्योंकि सशक्त लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जागरूक नागरिकों में निहित होती है और ऐसे नागरिकों का निर्माण केवल न्यायपूर्ण, पारदर्शी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से ही संभव है।
(लेखिका सामाजिक चिंतक हैं)
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