Suchindram Thanumalayan Temple: जहाँ एक ही शिवलिंग में बसते हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश, खंभों से निकलती है संगीत की धुन
Suchindram Thanumalayan Temple: तमिलनाडु के कन्याकुमारी में स्थित सुचिन्द्रम थानुमलयन मंदिर अपनी वास्तुकला और धार्मिक महत्व के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। आम तौर पर किसी मंदिर में एक ही आराध्य देव की पूजा की जाती है, लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मुख्य प्रतिमा है। यहाँ एक ही पवित्र शिवलिंग के भीतर सृष्टि के तीनों रचयिता ब्रह्मा, विष्णु और महेश समाए हुए हैं।
इस मंदिर के नाम थानुमलयन में ही इसका गहरा अर्थ छिपा है, जहाँ थानू का तात्पर्य भगवान शिव से है, मल का अर्थ भगवान विष्णु और अयन का संबंध ब्रह्मा जी से है। त्रिदेवों की यह संयुक्त उपस्थिति इस पावन स्थल को अद्वितीय बनाती है।
तीन राजवंशों का इतिहास
इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण में प्राचीन भारत के तीन महान राजवंशों चोल, चेर और पांड्य राजाओं का अमूल्य योगदान रहा है। यही वजह है कि इसके स्थापत्य में केरल और तमिलनाडु की शिल्पकला का एक बेहद खूबसूरत मिश्रण देखने को मिलता है। बाद में 17वीं शताब्दी के दौरान त्रावणकोर के महाराजाओं ने इसका जीर्णोद्धार करवाकर इसे नया भव्य रूप दिया।
इस मंदिर के सबसे बड़े आकर्षण यहाँ के चमत्कारी संगीतमय खंभे हैं। प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग के इस बेजोड़ नमूने को किसी जोड़-तोड़ से नहीं, बल्कि एक ही विशाल चट्टान को काटकर तराशा गया है, जिन्हें थपथपाने पर मधुर संगीत सुनाई देता है। इसके अलावा, परिसर में पुष्करणी नामक एक अत्यंत स्वच्छ और पवित्र सरोवर है। यह मंदिर सदियों से शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच आपसी सद्भाव का प्रतीक रहा है।
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देवराज इंद्र के श्राप मुक्ति की कथा
स्कंद पुराण और प्राचीन अभिलेखों के अनुसार, देवराज इंद्र को मिले एक श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने इसी स्थान पर कठोर तपस्या की थी। ऐसी मान्यता है कि आज भी इंद्र देव अदृश्य रूप में हर रात यहाँ आकर भगवान की मुख्य पूजा करते हैं।
इसके साथ ही, मंदिर परिसर में संकटमोचन हनुमान जी की एक अत्यंत भव्य और विशाल प्रतिमा स्थापित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 18 फीट है। इस पूरी मूर्ति को भी एक ही चट्टान से काटकर बनाया गया है। इतिहासकारों के मुताबिक, टीपू सुल्तान के आक्रमण के समय इस ऐतिहासिक मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए जमीन के नीचे छिपा दिया गया था, जिसे सदियों बाद साल 1930 में खोजकर दोबारा पूरे सम्मान के साथ स्थापित किया गया।
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