MP High Court ने भोजशाला को बताया मंदिर, मस्जिद का दावा खारिज, सरकार से अयोध्या जैसे इंतजाम के निर्देश
Bhojshala verdict: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर विवाद में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक और निर्णायक फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पूरा परिसर वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है, जबकि मुस्लिम पक्ष द्वारा इसे कमाल मौला मस्जिद बताने का दावा खारिज कर दिया गया। साथ ही, कोर्ट ने अयोध्या प्रकरण की तर्ज पर मुस्लिम समुदाय के लिए उचित व्यवस्था करने का दायित्व राज्य सरकार पर छोड़ दिया।
#WATCH इंदौर, मध्य प्रदेश: एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने कहा, "भोजशाला केस में इंदौर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया है। कोर्ट ने भोजशाला परिसर को एक हिंदू मंदिर माना है। कोर्ट ने हिंदुओं को वहां पूजा करने का अधिकार भी दिया है… कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को कहा है कि वे अपना एक… pic.twitter.com/r6mYc08Xao
— ANI_HindiNews (@AHindinews) May 15, 2026
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह विवादित क्षेत्र 18 मार्च 1904 से ही एक संरक्षित स्मारक है और इसकी धार्मिक प्रकृति मूलतः भोजशाला अर्थात वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर की ही है। इसके साथ ही, कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का वह 2003 का आदेश भी रद्द कर दिया, जिसके तहत हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर रोक लगाकर केवल मुस्लिम समुदाय को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी।

12 मई को रखा था फैसला सुरक्षित
हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने इस मामले से जुड़ी पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर 6 अप्रैल से नियमित सुनवाई शुरू की थी। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 12 मई को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया।
हिंदू, मुस्लिम और जैन, तीनों के दावों पर कसौटी
गौरतलब है कि इस परिसर को लेकर तीन समुदायों के दावे हैं। हिंदू पक्ष इसे वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मूल मंदिर मानता है। मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। जैन समुदाय का एक याचिकाकर्ता इसे मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा करता है। हाई कोर्ट ने हजारों दस्तावेजों, ऐतिहासिक तथ्यों और सभी धार्मिक विश्वासों की बारीकी से जांच के बाद यह फैसला सुनाया।

ASI की 2,000 पन्नों वाली रिपोर्ट बनी आधार
कोर्ट के आदेश पर ASI द्वारा 22 मार्च 2024 से शुरू किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में 98 दिनों की मेहनत के बाद 15 जुलाई 2024 को 2,000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में स्पष्ट संकेत दिया गया कि परिसर में परमार राजाओं के काल की एक विशाल संरचना पहले से मौजूद थी और वर्तमान विवादित ढांचा पुराने मंदिरों के हिस्सों को पुनः उपयोग में लाकर बनाया गया था।
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हिंदू पक्ष ने सर्वेक्षण में मिले सिक्के, मूर्तियां और शिलालेखों को अपने दावे का मजबूत प्रमाण बताया। वहीं मुस्लिम पक्ष ने इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण करार दिया। हालांकि, ASI ने अदालत को बताया कि सर्वेक्षण टीम में तीन मुस्लिम विशेषज्ञ भी शामिल थे और सर्वेक्षण के दौरान मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि भी मौके पर मौजूद रहे।
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