पूर्व सेना प्रमुख मनोज नरवणे ने खोले राज, ऑपरेशन सिंदूर पर की बड़ी बात
गुरुग्राम: भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी नई किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ एंड मिस्ट्रीज’ के जरिए सेना की भूमिका, चीन-पाकिस्तान मोर्चे और वैश्विक सुरक्षा हालात पर अपनी राय रखी है। एक न्यूज एजेंसी के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि इस किताब में कुल 25 चैप्टर हैं, जिनमें से हर एक अलग कहानी है। उन्होंने बताया कि शशि थरूर की किताब ‘ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स’ पढ़ने के बाद उनके मन में आया कि क्यों न वह भी ऐसा ही कुछ लिखें, लेकिन फौज से जुड़ी उन दिलचस्प और कम चर्चित बातों पर जिनसे आम जनता अनभिज्ञ है।
सिख-मुगल युद्ध से जुड़ी रोचक कहानी
जनरल नरवणे ने अपने सबसे पसंदीदा चैप्टर ‘चक दे फट्टे’ के बारे में विस्तार से बताया। यह नारा उनकी रेजिमेंट का है और आज यह शब्द फिल्मों से लेकर आम बोलचाल तक में घुलमिल गया है, लेकिन बहुत कम लोग इसकी असली जड़ें जानते हैं। पूर्व सेना प्रमुख ने खुलासा किया कि यह शब्द सिखों और मुगलों के बीच हुई ऐतिहासिक लड़ाइयों से जुड़ा है। जब सिख सेना मुगल कैंप पर हमला करके वापस लौटती थी, तो वे रास्ते में बने लकड़ी के पुलों के फट्टे उखाड़ देते थे ताकि मुगल उनका पीछा न कर सकें। इसी दौरान वे एक-दूसरे से ‘चक दे फट्टे’ कहते थे, यानी काम पूरा हो चुका है। यह ऐतिहासिक सच्चाई उनकी किताब के कई ऐसे ही रोचक प्रसंगों में से एक है।
फोर स्टार डेस्टिनी विवाद पर सफाई
जनरल नरवणे की पिछली किताब ‘फोर स्टार डेस्टिनी’ विवादों में घिरी थी और राहुल गांधी इसे लेकर संसद तक पहुंच गए थे। अब इस सवाल पर उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने उस किताब की फाइनल कॉपी खुद नहीं देखी है। प्रकाशक ने भी यह स्पष्ट किया है कि उस किताब की कोई आधिकारिक प्रति सर्कुलेशन में नहीं है। इस प्रश्न पर कि क्या ‘जो उचित समझो, वो करो’ लाइन का गलत अर्थ निकाला गया, उन्होंने कहा कि फौज को ऑपरेशन के दौरान पूरी छूट दी जाती है, जो यह दर्शाता है कि सरकार को सेना पर पूरा भरोसा है। अगर किसी को हर चीज गलत दिखती है, तो इसमें सेना या लेखक का क्या दोष?
राजनीति और आदेश में स्पष्ट अंतर
सेना को राजनीति में खींचे जाने के सवाल पर पूर्व सेना प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय सेना और अन्य सशस्त्र बल पूरी तरह से गैर-राजनीतिक हैं। सेना का काम राजनीतिक नेतृत्व के आदेशों का पालन करना है, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सेना राजनीतिक हो गई है। उन्होंने सरल उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे कोई जूनियर अपने सीनियर का आदेश मानता है, उसी तरह सेना रक्षा मंत्री के आदेश का पालन करती है। यह राजनीति में शामिल होना नहीं है – दोनों के बीच एक स्पष्ट और बुनियादी अंतर है।
सीमा पर चीन को दी थी मुंहतोड़ जवाब
चीन सीमा विवाद पर जनरल नरवणे ने कहा कि भारत ने एकजुट होकर कार्रवाई की और इसी एकता की बदौलत सफलता मिली। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारतीय सेना की कार्रवाई के कारण ही पीएलए (चीनी सेना) को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनके अनुसार यदि दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर करना जीत नहीं है, तो फिर जीत क्या है? उन्होंने तीखे स्वर में कहा कि अगर लोग इस जीत को भी स्वीकार नहीं करना चाहते, तो इस पर आगे कुछ कहना व्यर्थ है।
पहली बार नेतृत्व के मुख्यालय को बनाया गया निशाना
ऑपरेशन सिंदूर को एक साल पूरा होने पर बात करते हुए पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि इस ऑपरेशन में जो बदलाव आया, वह बेहद अहम था। पहले सिर्फ आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया जाता था, लेकिन इस बार उनके नेतृत्व के मुख्यालय को भी टार्गेट किया गया। यही कारण है कि रक्षा मंत्री ने कहा था कि ‘घर में घुसकर मारेंगे’। नरवणे ने कहा कि इस सख्त रवैये से पाकिस्तान को यह जरूर संदेश गया होगा कि अब पुरानी हरकतों पर उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, और यह कोई खोखली धमकी नहीं थी।
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हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी
ईरान-अमेरिका संघर्ष और चल रहे वैश्विक तनाव से सीख के सवाल पर जनरल नरवणे ने कहा कि हर युद्ध के बाद उसका गहन विश्लेषण करना चाहिए और वहीं से असली सीख मिलती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वर्तमान हालात में सबसे बड़ी सीख यह है कि भारत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना ही होगा– चाहे वह तेल हो, क्रिटिकल मिनरल्स हो, या फिर रक्षा उपकरण। बिना आत्मनिर्भरता के कोई भी देश लंबे समय तक अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता।
पाकिस्तान की पुरानी रणनीति
पाकिस्तान द्वारा वैश्विक तनाव का फायदा उठाने की आदत पर जनरल नरवणे ने कहा कि यह कोई नई चाल नहीं है। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि जब ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ शुरू हुआ, तो पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका के साथ जोड़ लिया। उससे पहले रूस-अफगानिस्तान संघर्ष में भी वह फ्रंटलाइन स्टेट बनकर अमेरिका की मदद करता रहा। लेकिन पूर्व सेना प्रमुख ने चेताया कि इस रणनीति के दीर्घकालिक परिणाम हमेशा नकारात्मक ही रहे हैं, पाकिस्तान ने इस रास्ते पर चलकर खुद को कभी न सुलझने वाली समस्याओं में उलझा लिया है।
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