मुगलों से पहले ताजमहल की जमीन का कौन था मालिक, जानिए शाहजहां और राजा जयसिंह का वो शाही सौदा

Taj Mahal History

Taj Mahal History: 17वीं सदी में मुगल शहंशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल का निर्माण कराया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस जगह पर यह संगमरमरी इमारत खड़ी है, उसका मालिक कोई मुगल शासक नहीं बल्कि आमेर (जयपुर) का कछवाहा राजपूत राजघराना था। आम धारणा के विपरीत, मुगलों ने यह जमीन ताकत के बल पर नहीं छीनी थी, बल्कि इसके एवज में दोनों पक्षों के बीच एक सम्मानजनक सौदा हुआ था।

यह ऐतिहासिक कहानी 1631 से शुरू होती है। बुरहानपुर में मुमताज महल के इंतकाल के बाद उनके शव को पहले वहीं दफनाया गया था। लगभग छह महीने बाद पार्थिव शरीर को आगरा लाया गया। शाहजहां को मुमताज के अंतिम विश्राम स्थल के लिए यमुना किनारे की यह सबसे खूबसूरत जगह पसंद आई।

मिर्जा राजा जयसिंह की थी जमीन

यह जमीन आमेर के राजा मिर्जा राजा जयसिंह की थी, जो शाहजहां के बेहद खास और भरोसेमंद मनसबदारों में से एक थे। मुगलकालीन आधिकारिक दस्तावेजों, जैसे पादशाहनामा में स्पष्ट दर्ज है कि यह जमीन पहले राजा जयसिंह के दादा राजा मानसिंह की हुआ करती थी और वहां एक विशाल हवेली बनी हुई थी।

Taj Mahal History

शाही फरमान से हुआ हवेलियों का लेन-देन

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के रिकॉर्ड और उस दौर के शाही फरमानों के अनुसार, शाहजहां ने जमीन हासिल करने के लिए ताकत के बजाय कूटनीति और दोस्ती का रास्ता चुना। राजा मानसिंह की उस हवेली और जमीन के बदले, जिसे मुमताज महल के मक़बरे (ताजमहल) के लिए खुशी-खुशी दिया गया, राजा जयसिंह को शाही जागीर से आगरा के प्रमुख वीआईपी इलाके में चार बड़ी और आलीशान हवेलियां सौंपी गईं। हाल ही में जयपुर राजघराने की सदस्य और राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि उनके पारिवारिक पोथीखाना (दस्तावेजों) में इस जमीन के बदले उचित मुआवजा और हवेलियां मिलने का स्पष्ट उल्लेख है।

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20 हजार कारीगरों ने 20 साल में तराशा शाहकार

जमीन अधिग्रहण के बाद 1632 में ताजमहल का निर्माण कार्य शुरू हुआ, जो लगभग 1653 में जाकर पूरा हुआ। इस भव्य इमारत को आकार देने में देश-विदेश के 20,000 से अधिक कारीगरों और मजदूरों ने 20 वर्षों तक लगातार काम किया था।

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