तीन दिन से अंधेरे में डूबा है गांव, गुमराह करने में लगा है पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम

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बस्ती। उनकी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये बाते किताबी हैं। गांव के हालात पर अदम गोंडवी की यह रचना दशकों पहले व्यवस्था पर सवाल करती थीं आज भी गांवों के हालात बयां करने के लिए काफी हैं। बस्ती जनपद में 9 मई को आई तेज आंधी—पानी में कई पेड़ गिर गए तो कई विद्युत पोल भी टूट गए। लेकिन गांवों की हालत यह है कि तीन दिन बाद भी विद्युत आपूति सुनिश्चित नहीं हो पाई।

जानकारी के मुताबिक बस्ती जनपद के कप्तानगंज उपकेंद्र के दुबौला—हरदी फीडर के अंतर्गत आने वाले गांव बेलघाट में बीते तीन दिन से लाइट नहीं आ रही है, ग्रामीणों की तरफ से इसकी शिकायत की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद 11 मई को ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा और यूपीपीसीएल पर ट्टीट कर विद्युत समस्या की शिकायत दर्ज कराई गई। लेकिन पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम बस्ती की तरफ से विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित कराने की जगह सबकुछ ठीकठाक होने का दावा किया जा रहा है।

जानकारी के मुताबिक 11 मई को ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा और यूपीपीसीएल को शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसपर यूपपीपीसीएल की तरफ से पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम को शिकायत निस्तारण के लिए निर्देशित किया गया था। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम बस्ती की तरफ से शिकायतकर्ता को फोन करके विद्युत आपूर्ति बाधित होने के संदर्भ में जानकारी ली गई और बताया गया कि आपका कंप्लेंट दर्ज कर ली गई है, जल्द ही समस्या का निस्तारण करा दिया जाएगा। शिकायत रजिस्टर्ड नं. पीयू 1105210822 बताया गया।

लेकिन 12 मई तक विद्युत आपूति सुनिश्चित न होने पर जब स्थिति की जानकारी की गई तो पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम बस्ती की तरफ से कहा गया कि अवर अभियंता की तरफ से उन्हें अवगत कराया गया है कि विद्युत आपूर्ति सामान्य कर दी गई है। इसे विद्युत विभाग की लापरवाही माना जाए या मनमानी। समस्या समाप्त किए बिना ही यह दावा करना की विद्युत आपूर्ति बहाल कर दी गई है यह दर्शाता है कि जिम्मेदार समस्याओं के प्रति कितना गंभीर हैं।

सरकार की नजर में जगमग हैं गांव

जब सरकारें अधिकारियों के भरोसे चलने लगती हैं तो दावों और हकीकत की बीच गहरी खाई बन जाती है। सरकार के दावे सरकारी आंकड़ों के आधार पर होती है, जबकि हकीकत से जनता को दो—चार होना पड़ता है, जिसका परिणाम होता है कि जनता न सरकारी आंकड़ों पर भरोसा कर पाती है और सरकार से उसका भरोसा उठ जात है। बीजेपी सरकार में यही हो रहा है। सरकार की नजर में गांवों का विद्युतीकरण करा दिया गया है। सबको भरपूर मात्रा में बिजली मिल रही है। जबकि सच यह है विद्युत कर्मचारी विद्युत आपूर्ति की समस्या का समाधान करने में रिश्वत खोजने में लगे हुए हैं।

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सरकार ने छीन लिया केरोसिन

मोदी सरकार से पहले पूर्ववर्ती सरकारों की तरफ से ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी गल्ले की दुकान से ग्रामीणों को केरोसिन भी दिया जाता था, जिससे बिजली न रहने पर ग्रामीण लैम्प—लालटेन जलाकर अपना काम चला लेते थे। लेकिन मोदी सरकार केंद्र में आते ही विद्युतीकरण के नाम पर लोगों के हक का केरोसिन खत्म कर दिया गया। आज आलम यह है कि सरकारी की मनमानी का खमियाजा गांव वालों को भुगतना पड़ रहा है। विद्युत न आने पर घर में उजियारा करने के लिए मोमबत्ती का सहारा लेना पड़ रहा है। विद्युत विभाग ग्रामीणों की इन समस्याओं से अनजान विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित कराने की जगह कागजों में अपूर्ति सामन्य करने का दावा करने में लगी है।

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