आंदोलनजीवी राजनीति का हिंदू अर्थव्यवस्था के विरुद्ध षड्यंत्र

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Acharya Sanjay Tiwari
आचार्य संजय तिवारी

त्योहार क्या होते हैं। क्यों होते हैं। केवल दीया और फूल नहीं होते। त्योहार इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। जब दीपावली आती है तो हिंदू घर में केवल लक्ष्मी जी की पूजा नहीं होती। कुम्हार का दिया बिकता है, सुनार का सोना बिकता है, कपड़े वाले का लहंगा बिकता है, हलवाई की मिठाई बिकती है, मजदूर को बोनस मिलता है, ट्रक वाले को भाड़ा मिलता है। एक त्योहार से करोड़ों घरों का चूल्हा जलता है। जब लगन का मौसम आता है- तो यह अर्थव्यवस्था दुगनी हो जाती है। नवंबर से फरवरी तक भारत में लगभग 40 लाख शादियाँ होती हैं। अनुमान है 6 लाख करोड़ रुपये का व्यापार। बैंड वाला, टेंट वाला, हलवाई, फोटोग्राफर, मेकअप आर्टिस्ट, साड़ी वाला, ज्वेलर्स, फूल वाला – एक शादी से 100 परिवारों की रोजी चलती है।

यह भारत की अदृश्य GDP है। यह हिंदू त्योहार और हिंदू लगन की GDP है। ठीक इसी GDP पर इस समय हमला हो रहा है। दिल्ली समेत देश भर में धरना, प्रदर्शन, जाम, उपद्रव का एक सुनियोजित खेल चल रहा है। और इस खेल के खिलाड़ी वही हैं- सीजेपी जैसे विदेशी फंड से चलने वाले संगठन, और कांग्रेस समेत वही नेता जिनका हिंदू त्योहार से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा, पर हिंदू समाज के सबसे महत्वपूर्ण समय को बर्बाद करने में सबसे आगे रहते हैं।

यह आलेख आक्रोश का नहीं, अर्थशास्त्र का है। यह समझना जरूरी है कि कैसे त्योहार के समय किया गया एक जाम, केवल जाम नहीं, एक पूरे समाज की रोजी-रोटी पर लात है। दिल्ली की थोक मंडियां- हिंदू व्यापार का हृदय स्थल हैं। दिल्ली केवल राजधानी नहीं, भारत की थोक मंडी है। चांदनी चौक, सदर बाजार, गांधी नगर, भागीरथ पैलेस, लाजपत नगर, करोल बाग ये नाम केवल बाजार नहीं, भारत की आपूर्ति श्रृंखला हैं।

चांदनी चौक से पूरे उत्तर भारत में शादी की साड़ी, लहंगा जाता है। सदर बाजार से पूरे भारत में दीपावली की लाइट, सजावट, गिफ्ट आइटम जाता है।

गांधी नगर एशिया की सबसे बड़ी गारमेंट मंडी है, यहाँ से त्योहार के कपड़े गाँव-गाँव तक जाते हैं।

भागीरथ पैलेस से लाइट, झालर, इलेक्ट्रॉनिक सामान जाता है। खारी बावली से मसाले, ड्राई फ्रूट- जो हर शादी, हर त्योहार में चाहिए।

इस समय इन मंडियों का हाल क्या है

त्योहार का सीजन है। दुकानदार ने 6 महीने पहले ऑर्डर दिया। कर्ज लेकर माल भरा। कारीगरों को एडवांस दिया। सोचा दीपावली और लगन में बेचकर साल भर का खर्च निकलेगा, बच्चों की फीस भरेगा। तभी धरना शुरू। प्रदर्शन शुरू। सड़क जाम। मेट्रो बंद। ट्रक रोक दिए। दिल्ली की सीमा सील जैसी। खारी बावली का व्यापारी कहता है- “साब, ट्रक पंजाब से नहीं आ पा रहा, जाम में फंसा है। मसाला सड़ जाएगा।”

गांधी नगर का व्यापारी कहता है- “लेबर नहीं आ पा रही, ऑटो नहीं चल रहे, धरने के कारण। माल पैक कैसे हो?” सदर बाजार का व्यापारी कहता है- “ग्राहक डर के कारण दिल्ली नहीं आ रहा। सोचता है कहीं फंस न जाऊं।” एक जाम का असर केवल उस सड़क पर नहीं, पूरे भारत पर पड़ता है। बिहार के एक छोटे से शहर में बैठी बेटी की शादी के लिए लहंगा महंगा हो जाता है, क्योंकि दिल्ली से ट्रक नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश के एक गाँव में दीपावली का झालर महंगा हो जाता है, क्योंकि सप्लाई टूट गई। यह कौन सी राजनीति है जो त्योहार को महंगा करती है?

सीजेपी, कांग्रेस और धरना-जीवी गैंग ही हैं। इनका पैटर्न समझिए। यह पहली बार नहीं हो रहा। यह पैटर्न है। ध्यान दीजिए- जब भी हिंदू समाज का बड़ा समय आता है, तभी धरना-प्रदर्शन क्यों? जब कांवड़ यात्रा चलती है, तभी सड़कों पर दूसरा जाम। जब दीपावली आती है, तभी दिल्ली में प्रदूषण के नाम पर हिंदू पटाखों पर हमला, और साथ में धरना। जब छठ आती है, तभी यमुना पर राजनीति। जब रामनवमी, हनुमान जयंती आती है, तभी किसी न किसी बहाने शोभायात्रा रोकने की कोशिश। और जब लगन का मौसम आता है, तभी किसान, पहलवान, या किसी और नाम पर दिल्ली घेरो।

सीजेपी जैसे संगठन। एक अन्य नाम – Citizens for Justice and Peace। काम – हर समय हिंदू त्योहार और हिंदू आस्था के खिलाफ याचिका, रिपोर्ट, धरना। इनका पूरा मॉडल विदेशी फंडिंग पर चलता है। यूरोप-अमेरिका से पैसा आता है, यहाँ भारत की छवि खराब करने के लिए रिपोर्ट बनती है। त्योहार के समय ही इन्हें भारत में मानवाधिकार याद आता है। दीपावली पर पटाखा बैन की याचिका, होली पर पानी बचाओ का ज्ञान और लगन के समय- “धरना हमारा अधिकार” का ज्ञान। अधिकार किस कीमत पर? गरीब की रोजी की कीमत पर? और कांग्रेस?

कांग्रेस की तो पूरी राजनीति ही हिंदू त्योहार के विरुद्ध रही है। कभी राम मंदिर का विरोध, कभी राम सेतु को काल्पनिक बताना, कभी भगवा आतंकवाद का झूठ। आज जब पूरा भारत दीपावली और शादियों की तैयारी में लगा है, तो कांग्रेस के नेता उसी धरने को समर्थन दे रहे हैं जो बाजार बंद करा रहा है। राहुल गांधी विदेश में जाकर भारत को बदनाम करते हैं, यहाँ उनके समर्थक दिल्ली जाम करके भारत के व्यापारी को बदनाम करते हैं। क्या यह संयोग है? नहीं, यह प्रयोग है। यह अर्थव्यवस्था पर हमला है।

अंग्रेज भी यही करते थे। जब भारतीय बाजार उठता था, तो वे किसी न किसी कानून से उसे दबा देते थे। आज अंग्रेज नहीं, पर उनके मानसिक गुलाम वही कर रहे हैं। त्योहार के समय बाजार दबा दो, ताकि हिंदू व्यापारी टूट जाए, हिंदू कारीगर टूट जाए, और हिंदू समाज को लगे कि उसका त्योहार ही बोझ है। रोजी-रोटी पर सीधा हमला- आंकड़ों से समझिए। मैं भावुक बात नहीं, आंकड़े की बात करता हूँ।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के अनुसार, दीपावली सीजन 2024 में लगभग 4.25 लाख करोड़ का व्यापार हुआ। 2025 में अनुमान 4.75 लाख करोड़ का था। इस साल भी वही उम्मीद थी। पर दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के कारण- दिल्ली की थोक मंडियों में फुटफॉल 30-40% गिरा।।ट्रांसपोर्ट भाड़ा 25% बढ़ा क्योंकि ट्रक चक्कर काट रहे हैं।

छोटे दुकानदार जो रोज माल लाते हैं, उनका माल सड़ रहा है। फूल, फल, सब्जी, मिठाई का सामान, यह धरने का इंतजार नहीं करता। एक हलवाई को देखिए। उसने दीपावली के लिए 10 क्विंटल घी, मावा, चीनी लाई। कारीगर बुलाए। सोचा 15 दिन में 20 लाख की मिठाई बेचेगा। पर धरने के कारण बाजार में ग्राहक ही नहीं आ रहा। मिठाई खराब हो जाएगी। 20 लाख का नुकसान। कौन भरेगा? क्या सीजेपी भरेगा? क्या कांग्रेस भरेगी?। एक बैंड वाले को देखिए। उसके पास नवंबर में 30 बुकिंग थी। हर बुकिंग 50,000 रुपये। यानी 15 लाख का सीजन। पर अब ग्राहक कह रहा है- “भैया, दिल्ली से सामान नहीं आ रहा, शादी पोस्टपोन कर दी।” 15 लाख गया। उसके 10 मजदूर बेरोजगार।

एक फूल वाले को देखिए। शादी में फूल की सजावट का 2 लाख का ऑर्डर था। फूल कोलकाता से आना था। ट्रेन लेट, ट्रक जाम। फूल मुरझा गया। ऑर्डर कैंसिल। यह केवल एक फूल वाले की कहानी नहीं, पूरे भारत के असंगठित क्षेत्र की कहानी है। भारत की 80% रोजी-रोटी असंगठित क्षेत्र से है – वही क्षेत्र जो त्योहार और लगन पर जिंदा है। आंदोलन और धरना-जीवी नेता AC कमरे में बैठकर ट्वीट करते हैं- “यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है।” अधिकार किसका? सड़क जाम करके दूसरे का रोजगार खाने का अधिकार किस संविधान ने दिया?

संविधान ने धरना का अधिकार दिया है, पर संविधान ने ही व्यापार का अधिकार भी दिया है- Article 19(1)(g)। संविधान ने त्योहार मनाने का अधिकार भी दिया है। तुम्हारे धरने के अधिकार से मेरा व्यापार और त्योहार का अधिकार क्यों मारा जाए? हिंदू त्योहार को टारगेट क्यों?

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सांस्कृतिक अर्थशास्त्र समझिए

यह प्रश्न पूछना जरूरी है- धरना हमेशा हिंदू त्योहार पर ही क्यों? ईद पर कभी दिल्ली जाम नहीं होती। क्रिसमस पर कभी सप्लाई चेन नहीं तोड़ी जाती। पर दीपावली, दशहरा, छठ, और अब लगन पर ही क्यों? क्योंकि हिंदू त्योहार केवल धर्म नहीं, अर्थव्यवस्था भी हैं। हिंदू त्योहार विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था हैं। इस्लामिक या पश्चिमी त्योहार में अक्सर बड़ा ब्रांड, बड़ी कंपनी कमाती है। हिंदू त्योहार में छोटा आदमी कमाता है।

दीपावली का दिया – कुम्हार बनाता है, बड़ी कंपनी नहीं। होली का रंग – छोटे कारखाने में बनता है। राखी- गाँव की महिला बनाती है। शादी का लहंगा- करोल बाग का दर्जी बनाता है, Zara नहीं। शादी की मिठाई- लोकल हलवाई बनाता है, McDonald’s नहीं। हिंदू त्योहार भारत की MSME अर्थव्यवस्था हैं। भारत की आत्मनिर्भरता हैं। इसीलिए इन पर हमला होता है। क्योंकि यदि हिंदू त्योहार टूटा, तो भारत का छोटा व्यापारी टूटेगा। छोटा व्यापारी टूटा, तो भारत की आत्मनिर्भरता टूटेगी। और आत्मनिर्भरता टूटी, तो भारत फिर से विदेशी ब्रांड और विदेशी फंड पर निर्भर होगा, वही जो सीजेपी को पैसा देते हैं। यह अर्थशास्त्र का युद्ध है। यह संस्कृति का युद्ध है।

आप देखिए, जो लोग दीपावली पर ज्ञान देते हैं- “पटाखा मत फोड़ो, प्रदूषण होता है।” वही लोग धरने पर दिन-रात लाउडस्पीकर बजाते हैं, सड़क पर कचरा फैलाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति फूंकते हैं। क्या उससे प्रदूषण नहीं होता? यह दोगलापन क्यों? क्योंकि उद्देश्य प्रदूषण रोकना नहीं, त्योहार रोकना है। व्यापारी क्या चाहता है? एक सामान्य हिंदू की आवाज कौन सुने? पिछले 10 दिन में दिल्ली की कई मंडियों में बहुत कुछ दिखा। चांदनी चौक के एक कपड़ा व्यापारी ने, जो पिछले 40 साल से दुकान चला रहा है, रोते हुए कहा- “साब, हमने कोरोना झेला। लॉकडाउन झेला। सोचा अब इस दीपावली-लगन में भरपाई होगी। माल भर लिया। पर अब यह धरना। ग्राहक कह रहा है- दिल्ली मत आओ, जाम है। हम क्या करें? हम किससे कहें? हम तो टैक्स देते हैं, जीएसटी देते हैं, लाइसेंस फीस देते हैं। पर हमारी सुनने वाला कोई नहीं। नेता तो धरने वालों के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं।”

सदर बाजार की एक महिला दुकानदार, जो गिफ्ट आइटम बेचती है, कहती है- “मेरा पूरा साल इसी सीजन पर है। मेरे दो बच्चे हैं। मैंने कर्ज लेकर 20 लाख का माल भरा। अब माल नहीं बिकेगा तो मैं कर्ज कैसे चुकाऊँगी? क्या कांग्रेस मेरा कर्ज चुकाएगी?” यह एक व्यापारी की नहीं, पूरे हिंदू समाज की चीख है।।हिंदू समाज शांतिप्रिय है। वह धरना नहीं करता। वह काम करता है। वह सुबह 6 बजे दुकान खोलता है, रात 10 बजे बंद करता है। वह त्योहार मनाता है और दूसरों को भी मनवाता है। वह किसी का रास्ता नहीं रोकता। पर आज उसी का रास्ता रोका जा रहा है। उसी के त्योहार को खराब किया जा रहा है। उसी की रोजी-रोटी मारी जा रही है।

अब प्रश्न यह कि समाधान क्या है? सरकार और समाज दोनों को सोचना होगा। मैं सरकार से भी और समाज से भी कहना चाहता हूँ, त्योहार और लगन सीजन को एसेंशियल इकोनॉमिक पीरियड घोषित कीजिए। जैसे कोरोना में एसेंशियल सर्विस थी, वैसे ही अक्टूबर से मार्च तक दिल्ली की थोक मंडियों, ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को धरना-मुक्त रखिए। धरना करना है तो रामलीला मैदान में करो, सड़क पर नहीं। सीजेपी जैसी विदेशी फंडिंग वाले संगठनों की ऑडिट कीजिए। पैसा कहाँ से आ रहा है, और क्यों हर बार हिंदू त्योहार पर ही क्यों खर्च हो रहा है? व्यापारियों को मुआवजा नहीं, सुरक्षा दीजिए ताकि व्यापार बाधित न हो। व्यापारी मुआवजा नहीं मांगता, वह केवल यह मांगता है- मुझे मेरी दुकान तक ग्राहक आने दो, मेरा ट्रक आने दो।

समाज से कहना है कि लोकल के लिए वोकल बनो, इस समय और अधिक बनो। यदि दिल्ली नहीं जा सकते, तो अपने शहर के कुम्हार, हलवाई, दर्जी से सामान खरीदो। धरना-जीवी गैंग चाहता है कि तुम ऑनलाइन विदेशी कंपनी से खरीदो। तुम लोकल से खरीदो। धरना-जीवी राजनीति का बहिष्कार करो। जो नेता तुम्हारे त्योहार के समय तुम्हारा बाजार बंद कराए, उससे पूछो- तुम किसके लिए राजनीति करते हो? वोट हिंदू से लेते हो, काम हिंदू व्यापारी के खिलाफ करते हो? त्योहार को और बड़े पैमाने पर मनाइए। यह सबसे बड़ा उत्तर है। वे चाहते हैं तुम त्योहार न मनाओ। तुम और धूमधाम से मनाओ। एक दिया की जगह दो दिया जलाओ। एक मिठाई की जगह दो मिठाई बाँटो। यही तुम्हारा प्रतिरोध है।

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अंतिम बात यह कि यह लड़ाई सड़क की नहीं, संस्कृति की है। यह आलेख किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है। यह उस मानसिकता के खिलाफ है जो भारत के त्योहार को बोझ समझती है। भारत में धरना-प्रदर्शन होते रहेंगे, होने भी चाहिए। लोकतंत्र है। पर धरने का समय और स्थान भी तो देखो। जब पूरा देश महाशक्ति और महालक्ष्मी का स्वागत कर रहा है, तब सड़क जाम करके अलक्ष्मी क्यों ला रहे हो? जब एक पिता अपनी बेटी की शादी के लिए 10 साल से पैसा जोड़ रहा है, तब उसकी शादी का सामान रोककर तुम्हें कौन सा न्याय मिल रहा है? यह न्याय नहीं, अन्याय है। यह अधिकार नहीं, अत्याचार है। हिंदू समाज बहुत सहिष्णु है। वह सब सह लेता है। पर उसकी सहिष्णुता को उसकी कमजोरी मत समझो। जब उसकी रोजी-रोटी और उसके त्योहार पर हमला होगा, तो वह बोलेगा। और जब वह बोलेगा, तो दिल्ली ही नहीं, पूरा भारत बोलेगा।

(लेखक संस्कृति पत्रिका के संपादक हैं।)

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