तालिबान का फरमान, अब कुंवारी लड़कियों की चुप्पी को माना जाएगा शादी के लिए हां
काबुल: अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज होने के बाद से महिलाओं और बच्चियों की आजादी पर लगातार बेड़ियाँ कस रहे तालिबान ने अब एक और विवादास्पद कदम उठाया है। पढ़ाई, नौकरी, पहनावे और अकेले बाहर निकलने पर सख्त पाबंदियों के बाद अब तालिबान ने शादी, तलाक और बाल विवाह को लेकर एक नया विवादित कानून पेश किया है। इस नए शरीयत आधारित नियम की अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों द्वारा चौतरफा आलोचना की जा रही है।
लड़की मौन रही तो समझो शादी पक्की
अफगानी मीडिया अमू टीवी (Amu TV) की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए नियम को ‘पति-पत्नी के बीच अलगाव के सिद्धांत’ (Principles of Separation Between Spouses) शीर्षक के तहत तैयार किया गया है। 31 अनुच्छेदों (Articles) वाले इस रेगुलेशन को तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने हरी झंडी दे दी है और मई 2026 के मध्य में इसे सरकारी गजट में प्रकाशित भी कर दिया गया है।
इस आधिकारिक दस्तावेज का सबसे चौंकाने वाला और विवादित प्रावधान यह है कि यदि कोई वयस्क कुंवारी लड़की शादी की बात पर चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ही विवाह के लिए उसकी आधिकारिक सहमति (हां) मान लिया जाएगा। इसके विपरीत, नियम में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी पुरुष या पहले से विवाहित महिला (विधवा/तलाकशुदा) की चुप्पी को उनकी मर्जी नहीं माना जा सकता।

तालिबान के नए विवाह कानून की मुख्य बातें
विवादित प्रावधान: वयस्क कुंवारी लड़की की चुप्पी = शादी की मंजूरी।
अदालती दखल: व्यभिचार, धर्म परिवर्तन और पति के गायब होने पर अब सिर्फ तालिबान जज करेंगे फैसला।
जिहार पर पाबंदी: पति द्वारा पत्नी की तुलना प्रतिबंधित महिला रिश्तेदारों से करने पर कोर्ट करेगा हस्तक्षेप।
बाल विवाह और खियार अल-बुलुघ का खेल
दस्तावेज में बाल विवाह, लापता पति, जबरन अलगाव, धर्मत्याग (इस्लाम छोड़ना) और व्यभिचार के आरोपों को लेकर भी नियम तय किए गए हैं। नए फरमान में खियार अल-बुलुघ यानी युवा होने पर विकल्प चुनने के अधिकार का जिक्र है। इसके तहत यदि कम उम्र में किसी बच्चे की शादी कर दी जाती है, तो वह वयस्क होने पर इसे रद्द करने की मांग कर सकता है।
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हालांकि, इस नियम के आर्टिकल 5 में एक पेंच फंसाया गया है। यदि किसी नाबालिग की शादी उसके पिता या दादा के अलावा किसी अन्य रिश्तेदार ने तय की है, तो वह तभी वैध होगी जब लड़का-लड़की सामाजिक रूप से अनुकूल हों और दहेज उचित हो। अगर कोई बच्चा इस शादी को रद्द कराना चाहता है, तो वह सीधे ऐसा नहीं कर सकता; इसके लिए उसे तालिबान कोर्ट के आदेश का मोहताज होना पड़ेगा।
इसके साथ ही कानून में कहा गया है कि यदि लड़की के अभिभावक मानसिक रूप से अस्वस्थ, दुर्व्यवहार करने वाले या नैतिक रूप से भ्रष्ट पाए जाते हैं, तो ऐसी शादियों को अमान्य माना जाएगा।
यह बच्ची की आवाज को पूरी तरह दबाने की कोशिश
तालिबान के इस फरमान पर दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता जताई है। न्यूयॉर्क पोस्ट से बात करते हुए राजनीतिक विश्लेषक फहिमा मोहम्मद ने इस क्रूर कानून की आलोचना करते हुए कहा, बाल विवाह असल में विवाह नहीं, बल्कि एक अपराध है। एक मासूम बच्ची कभी भी शादी के लिए सही समझ के साथ सहमति नहीं दे सकती। ऐसे में उसकी चुप्पी को हां मान लेना बेहद खतरनाक है, क्योंकि यह डरी-सहमी लड़कियों की आवाज को हमेशा के लिए कुचल देने की कानूनी साजिश है।
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