इन कॉकरोचों को उड़ने दीजिए, असमर्थन का शिकार होकर खुद बेमौत मरेंगे

डिजिटल अराजकता या ऑनलाइन प्रोपगंडा? अराजकता भी है और प्रोपगंडा भी है। पर इसका कोई असर नहीं होने वाला है, जेन जी में भी यह तब्दील नहीं होने वाला है, राजनीतिक तख्तापलट की भी कोई उम्मीद नहीं बनती है। एक तो अभी तक इनकी भारत की भूमि पर कोई उपस्थिति दर्ज नहीं हुई है, अगर अराजक तत्व एक दो शहरों में उपद्रव कराने की भी कोशिश की तो फिर उससे निपटने के लिए सरकार की विश्वसनीयता मजबूत होगी। भारी पड़ेगी और देश का कानून भी किसी को प्रोपेगंडा फैलाने या अराजकता फैलाने का समर्थन नहीं कर सकता है। इसलिए भारत सरकार की कोई खास या कड़ी प्रतिक्रिया नहीं हुई है, कोई प्रबंधन नीति सामने नहीं आई है।
भारत सरकार और जनांदोलन विशेषज्ञों की अपनी राय है कि रातों रात जैसे यह ऑनलाइन प्रोपगंडा और डिजिटल अराजकता का हथकंडा दुनियां को अपने विस्तार और फॉलोअर की कसौटी पर चकित किया है वैसे ही यह रातोंरात खुद ही शिथिल पड़ जाएंगे या गायब हो जाएंगे। चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत के शिकार बन जायेंगे। पर कुछ लोग सपना जरूर देखने लगे हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी युग से घृणा है, जिन्हें नरेंद्र मोदी को हटाने से सफ़लता नहीं मिल रही है, वे जरूर चाहते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी नरेंद्र मोदी सरकार को हटाने का प्रतीक बने और वीरता दिखाए। वैसी विदेशी शक्तियों की भी सहानुभूति है जो मुस्लिम और ईसाई संप्रभुत्ता और अस्मिता के सहचर है और मोहरे है।
पाकिस्तान और चीन जैसे देश क्यों नहीं चाहेंगे कि भारत में भी जेन जी जैसी क्रांति हो और उनके समर्थक भारत की संप्रभुता पर विराजमान होकर उनकी गुलामी करे। कॉकरोच गंदगी का प्रतीक है, नुकसान ही करता है। इन कॉकरोचों के मारने के लिए कानून का हिट दवा उपलब्ध है पर भारत सरकार को इसकी जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
फॉलोअर्स की पहचान और संख्या कैसी है? फॉलोअर्स की पहचान क्या संदिग्ध है? फॉलोअर्स की पहचान क्या पाकिस्तान की अस्मिता से जुड़ी हुई है? फ़ॉलोअर्स की पहचान क्या मुस्लिम मानसिकता से जुड़ी हुई है? फॉलोअर्स की पहचान क्या भारत विरोधियों से जुड़ी हुई है? फॉलोअर्स की पहचान क्या एनजीओ से जुड़ी हुई है? फॉलोअर्स की पहचान अमेरिका यूरोप की चर्च मानसिकता से जुड़ी हुई है? यह सही है कि इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है, इनकी यूनियन बाजी और गोलबंदी भी भारत विरोधी है, इनकी अधिक से अधिक चर्चा और सक्रियता भारत विरोधी देशों में हुई है।

पाकिस्तान और चीन की मीडिया इसमें सक्रियता दिखाई है। चीन और पाकिस्तान की मीडिया ने कोकरेच जनता पार्टी के प्रति समर्थन जताया है, सहानुभूति प्रदर्शित की है और कहा है कि भारत में जेन जी की सफलता के सभी कारण मौजूद है। सभी परिस्थितियाँ उपस्थित हैं, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार है, सौतेला व्यवहार है, बेरोजगारी का दंश है और नरेंद्र मोदी की तानाशाही भी है जो बेरोजगारों के आक्रोश भड़काने और सड़कों पर उतरकर नरेंद्र मोदी की सरकार का तख्तापलट के लिए काफी है।
चीन की मीडिया को अपने देश में मानवधिकार हनन नहीं दिखता, कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही नहीं दिखती है। पाकिस्तान में खाने के लिए आटे तक नहीं है। भीख के कटोरे से उनकी अर्थव्यवस्था चल रही है, यह सब पाकिस्तान की मीडिया को दिखाई नहीं देता है। पर इन्हें नरेंद्र मोदी की सरकार खल जाती है और बेरोजगारी के जुमले में कॉकरोच जनता पार्टी के साथ खड़े हो जाते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि जोहरान के समर्थक गुट भी उनके साथ सक्रिय है। जो मुस्लिम मानसिकता से ग्रसित लोग जोहरान को राजनीति में स्थापित कर अमेरिका को मुस्लिम देश बनाने के लिए अपने दीर्घकालिक राजनीति रणनीति और अभियान में शामिल थे, वहीं लोग कॉकरोच जनता पार्टी और अभिजीत दीपके के साथ और पक्ष में खड़े हैं, इनके सबसे अधिक करीब यही तबका है।
इनकी फॉलोअर्स की संख्या मैने और मेरी वैश्विक मंच ने गंभीरता और सूक्ष्मता के साथ अध्ययन किया है और निष्कर्ष निकालने की बारीकी कोशिश की है। निष्कर्ष बहुत ही जहरीला है और साजिश पूर्ण है, साजिश में इंस्टाग्राम की भी भूमिका संदिग्ध लगती है। हमारी टीम का अध्ययन गणित भी देख लीजिए। कॉकरोच जनता पार्टी के दो करोड़ फॉलोअर्स में से 49 प्रतिशत पाकिस्तानी हैं, दस प्रतिशत बांग्लादेशी हैं, 20 प्रतिशत अरब के प्रवासी मुस्लिम है। शेष अमेरिका और यूरोप तथा भारत के लोग है। कॉकरोच की फॉलोअर्स संख्या जिस तरह से इंस्टाग्राम पर बढ़ी उस तरह से ऐक्स यानी टिवटर पर क्यों नहीं बढ़ी, ट्विटर पर कॉकरोच की संख्या कम थी?

भारत सरकार ने जब कॉकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम और ट्विटर हैंडल को भारत में बंद किया तो दुनिया भर में इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई और विरोध का स्वर भी तेज नहीं था। क्योंकि कठपुलिया खुद वीर नहीं होती हैं, वे करिश्मा नहीं करती हैं, कोई परिवर्तन भी नहीं करती हैं, क्रांति की बात तो दूर है, सिर्फ मनोरंजन करती हैं और पैंतरेबाजी दिखाती हैं। थोड़े देर के लिए यह मान लेते है कि कॉकरोच जनता पार्टी के सही में दो करोड़ भारतीय फॉलोअर्स हैं तो फिर ये सड़को पर उतरे क्यों नहीं?
दो करोड़ लोग अगर सड़कों पर उतरकर बगावत कर देंगे तो फिर उस बगावत को रोकना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव भी है। लेकिन प्रश्न यही है कि दो करोड़ भारतीय फॉलोअर्स हैं ही नहीं तो फिर क्रांति कैसे और कहा होगी? फॉलोअर्स अगर पाकिस्तानी हैं, चीनी है, जिहादी है, आतंकी हैं, मुस्लिम अस्मिता से युक्त है तो फिर भारत पर उसका प्रभाव तो नहीं पड़ने वाला है।
अभिजीत दीपके जैसे कोकरेच किसके मोहरे हैं और किसकी गुलामी करते हैं, किसके हित साधक होते हैं? अभिजीत दीपके कोई राजनीतिक नहीं है, कोई टेक्नोक्रेट नहीं है, कोई महान समाजशास्त्री नहीं है, कोई समाज सुधारक नहीं है, कोई क्रांतिकारी नहीं है, कोई सेलिब्रिटी भी नहीं है। वह अमेरिका में सिर्फ पढ़ाई कर रहा है। वास्तव में हमें अमरीकी विश्वविद्यालय की मुस्लिम परस्त राजनीति को समझना पड़ेगा। मुस्लिम दुनिया ने पूरी दुनिया को इस्लाम में तब्दील करने का मक्कड़जाल बिछा कर रख दिया है। कथित मानवधिकार के नाम पर अमेरिका के प्रवासी छात्रों को ब्रेन वाश कर रखा है।
हमास के पक्ष में इस्राइल के विरोध में अमेरिका के विश्व विद्यालयों में बड़ा ही विस्फोटक आंदोलन चलाया गया था, अमेरिका की संप्रभुता पर भी चोट हुई थी। डोनाल्ड ट्रंप ने एक्शन भी लिया था और डिपोर्ट का पाठ भी पढ़ाया था। कई भारतीय छात्रों को भी मुस्लिम पक्षधर, इस्राइल विरोधी राजनीति में शामिल होने की सजा मिली थी, और डिपोर्ट होकर भारत आने के लिए मजबूर हुए थे। पैसे और जोहरान जैसी हस्ती बनने का सपना दिखाया जाता हैं, इसके लिए अरब के मुस्लिम संगठन पैसा पानी की तरह बहाते हैं। अभिजीत दीपके इसी तरह की मानसिकता की उपज हैं।
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इनके समर्थन में कौन-कौन कूदे हैं, किनकी-किनकी बाहें खिली हुई है, किन चेहरों पर मुस्कान आई है? अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोगों को अवसर दिख रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार का पतन नजदीक दिख रहा है। ये सभी कौन लोग हैं? यह कौन नहीं जानता है? खासकर योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण की कोकरेच बयानबाजी थोड़ी चर्चित रही है, दोनों ने कहा है कि भारत में जेन जी बहुत जरूरी है, बेरोजगारी से त्रस्त युवा, किसान और मज़दूरों को सड़कों पर उतरना चाहिए और नरेंद्र मोदी की सरकार का संहार कर दिया जाना चाहिए।
योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण दोनों केजरीवाल के सताये हैं। ये रोज-रोज नया सपना देखते हैं, पर इनकी सुनता कोई नहीं है। पर इनकी अंतरराष्ट्रीय दुकानदारी चलती रहती है। केजरीवाल अविश्वसनीय हो चुके हैं। अन्ना को धोखा दिया, लाखों के सपनों को मारा, आये थे व्यवस्था परिवर्तन और राजनीति को बदलने पर शराब की दुकानदारी खोलकर बैठ गए। जनता ने इनका इलाज कर दिया, सत्ता से बाहर कर दिया। केजरीवाल पर अब युवा विश्वास क्यों करेंगे? देश में एक समूह ऐसा भी होता है जो हमेशा बागी रहता है। हर जगह से रिजेक्ट होते हैं, इस प्रकार के लोगों के लिए थोड़े समय के लिए कोकरोच एक अवसर हो सकता है। अंतिम सच यह है कि संदिग्ध, भारत विरोधी, विदेशी साजिश पर बैठे इन कॉकरोचों को मारने के लिए हिट जैसी दवा की भी जरूरत नहीं होगी। ये खुद असमर्थन और कानूनी कसौटियों पर बेमौत मरेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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