पर हे भारत! बचके रहना, तहखाने में साजिश है

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनिश्चित व्यवहार से पूरा विश्व असुरक्षा की आशंकाओं बीच गुजर रहा है। कहीं एक-दूसरे का वजूद मिटा देने वाला युद्ध है, कहीं सरकारों के तख्ता पलट करवाने का क्रम, तो कहीं दादागिरी के बल पर किसी राष्ट्रध्यक्ष का अपहरण। नाटो और यूरोपीय संघ की पुरानी वचनबद्ध मित्रता को भी दरकिनार करते हुए ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की जिद भी है।
जो अपने स्वार्थ के लिए नाटो और यूरोपीय संघ जैसे अपने विश्वास पात्रों से भी घात करने को तैयार है, दूसरों के साथ वह कितना वफादार होगा? इसे समझना कठिन नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ का लगभग अपाहिज स्थिति में पहुंच जाना सबसे अधिक चिंताजनक है क्योंकि इसकी स्थापना, विश्व की सबसे बड़ी ताकत के रूप में विश्व शांति सुनिश्चित करने के लिए हुई थी।
अमेरिकी प्रभाव से मुक्त, अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप शासन करने वाले देश और नेता अमेरिका को बर्दास्त नहीं। वियतनाम, क्यूबा, इराक, अफगानिस्तान एवं सीरिया आदि देशों का हस्र दुनिया देख चुकी है। अब नेपाल, बांग्लादेश के बाद ईरान में गृहयुद्ध करवाकर, वहां तख्ता पलट करवाना या करवाने की कोशिश, फिर गृहयुद्ध में तबाह हो चुके देश को पुनर्निर्माण के नाम पर अपने झंडे के नीचे लाने की महत्वाकांक्षा जारी है।
भारत में भी ऊपर से सब ठीक है। लेकिन तहखाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोध की सोच यहां तक पहुंच चुकी है कि अगर देश में आग लगाकर या देश को तोड़कर भी मोदी को हटाया जा सके, तो हटाया जाना चाहिए। वैश्विक और आंतरिक राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक शक्तियां इस सोच की झंडाबरदार हैं। वैश्विक शक्तियां तेजी से बढ़ रही भारत की ताकत से बेचैन हैं तो वहीं, अपने से दूर हो चुके दिल्ली सिंहासन के कारण बौखलाई आंतरिक राजनीति मोदी विरोध से आगे जाकर घोर ईर्ष्या और नफरत तक पहुंच चुकी है।
प्रधानमंत्री को नीच, घटिया, खून का दलाल आदि कहना, उनको मां की गाली देना, उनके मृत्यु की कामना और उनकी कब्र खोदने का नारा, खतरे तक पहुंच चुकी ईर्ष्या और दुर्भावना का सबूत तो है ही, साथ ही यह सब प्रजातंत्र में भाषाई-मर्यादा की अंत्येष्टि का भी दृश्य है।
विदेशी ताकतों के लिए देश में आग लगाने को जातीय, धार्मिक, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय और भाषाई मुद्दे पहले से विद्यमान हैं। तो वहीं देश से घात करने वाली जयचंद और मीरजाफरी नस्लें भी मौजूद हैं। इस फेहरिस्त में सम्प्रदाय विशेष के बारे में विषैला बयान देने वाले सत्ताधारी नेता, राष्ट्रीय भावनाओं के विपरीत कार्य करने वाला कांग्रेसी नेतृत्व, चीनी पक्षकार के रूप में सक्रिय कम्युनिस्टी कामरेड, घुसपैठियों से हमदर्द वाली तुक्ष्य सियासत, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए मजमा लगाने वाले कथित धर्मगुरु और धर्म को राष्ट्र से ऊपर बताकर मुस्लिम युवाओं के मन में जहर भरने वाले मौलाना लोग शामिल हैं।
फिलहाल बहुसंख्य जनता के मन में भारत बसने, कानून-व्यवस्था के अपेक्षाकृत सख्त होने और प्रशासन की मुस्तैदी से देश में हालात बांग्लादेश, नेपाल और ईरान जैसे नहीं हो पा रहे हैं। अन्यथा भारत को श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश बनाने का ऐलान, इसके लिए जेन-जी से सड़क पर उतरने की अपील, चिकन नेक को काटकर पूर्वोत्तर राज्यों को भारत से अलग करने की मंशा आदि का खुलेआम इजहार तो हो रहा ही है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के बेहद अहम मुद्दों (एनआरसी/सीएए/एसआईआर) को सूली पर टांगा जा रहा है। भारतीय संवैधानिक संस्थाओं (ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग आदि) के प्रति अविश्वास पैदा करने की खतरनाक कोशिश हो रही है। भारत में सिख तथा मुस्लिम समाज की आजादी खतरे में है, ऐसी अवधारणा बनाने के लिए विदेशों में प्रेस वार्ता आयोजित की जा रही हैं।
सबसे ऊपर, भारत में गृहयुद्ध के लिए सड़कों पर जेन-जी को उतरने को उकसाना है। इसके अलावा भारत तेरे टुकड़े होंगे वाले नारेबाजों के समर्थन में कांग्रेस व कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं का जेएनयू में उपस्थित होना, नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों के 56 जवानों की हत्या पर जेएनयू में आयोजित उत्सव पर विपक्षी दलों की खामोशी, डोकलाम और गलवान झड़प में भारतीय सेना की अदम्य बहादुरी पर गर्व करने की जगह ऐसी बातें करना जिससे चीन का पक्षपोषण होता हो, उसी समय रात के अंधियारे में कांग्रेस के बड़े नेता का चीनी राजदूत से गुपचुप मिलना, बालाकोट एयर स्ट्राइक के समय सेना पर भरोसा न करके सबूत मांगना, अपने सैन्य जनरलों के बयानों को दरकिनार कर युद्ध विराम पर ट्रंप के बयानों को प्रचारित करना, आपरेशन सिंदूर में भारत के कितने फाइटर गिरे? जैसा उल्टा सवाल पूछकर भारतीय सेना के मनोबल को तोड़ने की कोशिश, डोनाल्ड ट्रंप के दिवालिएपन का अनुसरण करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड इकोनॉमी बता कर देश को हताश करने का प्रयास आदि चित्त-भ्रम की ऐसी अवस्था है, जिसमें विपक्ष, मोदी विरोध और राष्ट्र विरोध के बीच अंतर कर पाने में असमर्थ दिखने लगा है।
विपक्ष की ऐसी कारगुजारियां विदेशी ताकतों (अमेरिका, चीन, टर्की, पाकिस्तान आदि) के मनोनुकूल है। तभी तो भारतीय नेताओं और अन्य भारतीयों के असहज बयान पाकिस्तानी टीवी पर दिन-रात प्रसारित किए जाते हैं। तीसरे कार्यकाल में भी प्रधानमंत्री के उसी वजन, उसी कद, उसी सक्रियता और लोकप्रियता से जब विश्व शक्तियां (अमेरिका, चीन आदि) डाह में हैं तो देश के अंदर मोदी विरोधियों के संताप (जलन) को समझना कठिन नहीं है।
मोदी सरकार को हटाने की हर कोशिश के बाद भी जनता ने तीसरी बार नरेंद्र मोदी के हाथों में राष्ट्र की कमान को सौंपा है। ऐसा इसलिए कि भारतीय जनता भोली और भावुक अवश्य है लेकिन निर्बुद्ध नहीं। वह व्यक्ति के आचरण की मर्यादा और चरित्र की संपदा को अपने हृदय की कसौटियों पर कसने के बाद ही उसे अपना नायक घोषित कर उसके हाथों में अपना सारा भविष्य सौंपती है।
इस सच्चाई का आंकलन करने की जगह अनाप-शनाप बकना आत्मघाती है। ऐसी स्थिति में आत्मसंयम और आत्मनिरीक्षण बेहद आवश्यक है अन्यथा यह स्थिति विक्षिप्तावस्था तक ले जाती है। जो पूर्ण पतन और नाश (अंत) का कारण भी हो सकता है।
ध्यान रहे, भारत में मतदाताओं की वह भारीभरकम जनसंख्या भी है, जिसके हृदय में कोई पार्टी नहीं, केवल राष्ट्र बसता है। यह जनसंख्या राष्ट्र विरोधी लगने वाली हर सियासत को नामंजूर करते हुए मोदी के पक्ष में मतदान करती है। मोदी के पक्ष में हिलोरा लेते इसी भारी मतदान को राजनीति की भाषा में लहर कहा जाता है और जनता का समर्थन पाने में असफल विपक्ष इस स्थिति को वोट चोरी का नाम देकर अपने बौनेपन को छिपाने की कोशिश करता है। वोट चोरी का यही यथार्थ है।
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लगभग एक दशक पहले तक अपनी सकारात्मक सोच और रचनात्मक कार्यों से जनमत तैयार करते हुए सत्ता परिवर्तित करने की स्वस्थ परम्परा थी। उसी परम्परा को कायम रखना जरूरी है। मोदी सरकार को हटाने का उद्देश्य गलत नहीं हो सकता लेकिन जब यह उद्देश्य विदेशी शक्तियों का भी हो और उसमें किसी भी तरह हटाने का तत्व जुड़ जाए तो वह, प्रजातंत्र और राष्ट्र दोनों की हिफाजत के लिए खतरनाक है।
एक आम भारतीय (हिंदू, मुसलमान, ईसाई आदि) को बेनजुएला, चीन, टर्की, पाकिस्तान, अमेरिका, नाटो, यूएनओ और ट्रंप की सनक से खास मतलब नहीं। कौतूहलवश वह इन मुद्दों पर आपस में गाल बजाकर अपनी रोजी-रोटी में लग जाता है। उसके दिल में सुरक्षित भारत की कामना। इस कामना पूर्ति के लिए हर भारतीय को हर समय जागरूक रहना पड़ेगा क्योंकि शासन की कोई भी पद्धति हो संपूर्ण शक्ति हमेशा जनता में ही बसती है। नायक कितना ही योग्य क्यों न हो, अपने पीछे जनशक्ति के बिना वह शून्य हो जाता है। विश्व के अनेक देशों के हालात सामने हैं। इसलिए-
सपूत मातृभूमि के – रुको न शूर साहसी!
प्रवीर हो, जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो।। (जयशंकर प्रसाद)।
(लेखक मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
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