अमेरिका से भारत तक संसद में कितनी है मुस्लिम सांसदों की हिस्सेदारी? जानें ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा का आंकड़ा
Newschuski Digital Desk: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा है। इस चुनाव में जीतने वाले मुस्लिम उम्मीदवार भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। खास तौर पर अब्दुल सईद ने सीनेट का चुनाव जीतकर सबका ध्यान खींचा है। इस चुनाव के बाद अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों की संसद में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी को लेकर बहस तेज हो गई है।
अमेरिका की संसद में 1.3 प्रतिशत मुस्लिम सांसद
अमेरिकी संसद में सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को मिलाकर कुल 535 सीटें हैं। इनमें 7 मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। इस तरह अमेरिकी संसद में मुस्लिम सांसदों की हिस्सेदारी करीब 1.3 प्रतिशत है।
भारत की तस्वीर इससे अलग है। यहां लोकसभा की 543 सीटों में 24 मुस्लिम सांसद हैं, जबकि 245 सदस्यीय राज्यसभा में 12 मुस्लिम सांसद बताए जा रहे हैं। दोनों सदनों को मिलाकर यह संख्या 36 होती है। कुल 788 सीटों के मुकाबले मुस्लिम सांसदों की हिस्सेदारी करीब 4.6 प्रतिशत है।
ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल में कितने मुस्लिम सांसद
दुनिया के दूसरे प्रमुख लोकतांत्रिक देशों पर नजर डालें तो वहां भी मुस्लिम समुदाय का संसदीय प्रतिनिधित्व अलग-अलग स्तर पर है।
ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 650 सीटें हैं। वर्ष 2024 के आम चुनाव में यहां 25 मुस्लिम सांसद चुने गए थे। यह कुल सीटों का करीब 3.85 प्रतिशत है।
फ्रांस की संसद के निचले सदन में 577 सीटें हैं, जिनमें 19 मुस्लिम सांसद बताए जाते हैं। इस हिसाब से उनकी हिस्सेदारी लगभग 3.30 प्रतिशत बैठती है।
इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। यहां 19 मुस्लिम सांसदों ने जीत हासिल की है। वहीं कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में 343 सीटों के मुकाबले 13 मुस्लिम सांसद हैं।

आबादी के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व कितना
संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या को संबंधित देशों की मुस्लिम आबादी के साथ रखकर देखें तो प्रतिनिधित्व को लेकर कई सवाल सामने आते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 1.9 प्रतिशत है। फ्रांस में यह लगभग 9 प्रतिशत, भारत में करीब 20 प्रतिशत और ब्रिटेन में लगभग 6 प्रतिशत बताई जाती है।
इजराइल में मुस्लिम आबादी करीब 18 प्रतिशत है, जबकि कनाडा में यह आंकड़ा लगभग 4.6 प्रतिशत है।
इन आंकड़ों के आधार पर अलग-अलग देशों में मुस्लिम समुदाय की आबादी और संसद में उसकी भागीदारी के बीच अंतर दिखाई देता है। यही वजह है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और चुनावी प्रक्रिया में अल्पसंख्यक समुदायों की हिस्सेदारी को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रहती है।
संसद में मुस्लिम भागीदारी कम रहने की क्या हैं वजहें
संसद में किसी समुदाय की भागीदारी केवल उसकी आबादी से तय नहीं होती, बल्कि राजनीतिक दलों की रणनीति, चुनावी व्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।
वर्ष 2021 में प्रकाशित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोध पत्र में मुस्लिम समुदाय के संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी के पीछे तीन प्रमुख कारणों की ओर ध्यान दिलाया गया था।
इसे भी पढ़ें: धर्मांतरण का आरोपी डॉ. रमीज के तार हिंदू धर्मगुरुओं की हत्या की साजिश रचने वाले रजा से जुड़े
पहला कारण: राजनीतिक दल कई बार मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने में पीछे रहते हैं। पार्टियों का जोर अक्सर ऐसे उम्मीदवारों पर होता है, जिन्हें चुनाव जीतने में सक्षम माना जाता है। इस प्रक्रिया में सामाजिक और धार्मिक विविधता को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।
दूसरा कारण: कई लोकतांत्रिक देशों में अल्पसंख्यक समुदायों की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में चुनावी राजनीति में उनकी मौजूदगी काफी हद तक राजनीतिक दलों के फैसलों पर निर्भर करती है।
तीसरा कारण: शोध में दक्षिणपंथी राजनीति के उभार को भी एक अहम वजह माना गया है। राजनीतिक माहौल में इस तरह की विचारधारा का प्रभाव बढ़ने से मुस्लिम उम्मीदवारों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सामने चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
लोकतंत्र में विविधता क्यों है जरूरी
लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों की आवाज उठाने का भी मंच है। ऐसे में संसद में विभिन्न समुदायों की पर्याप्त भागीदारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिमूलक बनाती है।
मुस्लिम समुदाय की आबादी और संसद में उसकी हिस्सेदारी के ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करते हैं कि क्या लोकतांत्रिक देशों की राजनीतिक व्यवस्था समाज की वास्तविक विविधता को पर्याप्त जगह दे पा रही है?
इसे भी पढ़ें: मतदाता सूची, चुनाव आयोग और राजनीतिक दंगल
