अंडरवर्ल्ड के प्रमुख मोहरे: दाऊद से लेकर लॉरेंस बिश्नोई तक जानें कैसे करते हैं गुमराह युवाओं का इस्तेमाल
Mumbai Underworld Shooters History: प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक और अंडरवर्ल्ड के इतिहास के बारीक जानकार राम गोपाल वर्मा ने हाल ही में मुंबई अंडरवर्ल्ड और आधुनिक आपराधिक गिरोहों के इकोसिस्टम पर एक सटीक विश्लेषण साझा किया है। उनका कहना है कि संगठित अपराध की दुनिया में शूटर (हिटमैन) सबसे आसानी से रिप्लेस (बदले) हो जाने वाले, सबसे सस्ते और सबसे ज्यादा डिस्पोजेबल (इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले) मोहरे होते हैं।
बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हाल ही में हुए हमले के आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की सराहना करते हुए राम गोपाल वर्मा की यह टिप्पणी आई है। 80 और 90 के दशक के खूंखार अंडरवर्ल्ड से लेकर आज के आधुनिक लॉरेंस बिश्नोई गैंग तक, युवाओं को मोहरा बनाने का यह घिनौना खेल कैसे खेला जाता रहा है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
80 और 90 का दशक तक अलग-अलग गैंग्स और भर्ती के तरीके
80 और 90 के दशक में मुंबई पुलिस के सख्त होने से पहले संगठित अपराध गिरोहों की रीढ़ उनके शूटर ही हुआ करते थे। जब कोई माफिया डॉन किसी बिल्डर, कारोबारी या फिल्म निर्माता को धमकी देता था, तो उसका खौफ इन शूटर्स के दम पर ही पैदा होता था।

डी-कंपनी (दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील)
1994 में दाऊद से छोटा राजन के अलग होने के बाद छोटा शकील ने कमान संभाली।
भर्ती के इलाके: भिंडी बाजार, डोंगरी, मझगांव, नागपाड़ा, अग्रीपाड़ा और माहिम जैसे निम्न-मध्यम वर्गीय इलाके।
रणनीति: मुख्य रूप से मुस्लिम युवाओं को पैसों, स्टाइलिश लाइफस्टाइल और 1993 ब्लास्ट के बाद उपजे धार्मिक ध्रुवीकरण के नाम पर उकसाकर भर्ती किया जाता था।
प्रमुख शूटर: फिरोज कोंकणी, मुन्ना झिंगाडा और फीलू खान।

नाना कंपनी (छोटा राजन)
दाऊद से अलग होने के बाद छोटा राजन ने अपना अलग सिंडिकेट खड़ा किया।
भर्ती के इलाके: चेंबूर, घाटकोपर, कुर्ला और धारावी।
रणनीति: मराठी और दक्षिण भारतीय युवाओं को पैसा देने के साथ-साथ ‘राष्ट्रवादी’ और ‘धार्मिक’ नरेटिव से जोड़ा जाता था। दाऊद को देशद्रोही बताकर उसके खिलाफ युवाओं को तैयार किया जाता था।
प्रमुख शूटर: रवि वोरा (डीके राव), सतीश थंगप्पन रेड्डी, विलास माने, साधु शेट्टी और फरीद तनाशा।

डैडी कंपनी (अरुण गवली)
गवली ने कभी देश नहीं छोड़ा और दगड़ी चॉल स्थित अपने घर या जेल से गिरोह चलाया।
भर्ती के इलाके: बंद हो चुकी मुंबई की कपड़ा मिलों के मजदूर परिवार।
रणनीति: बेरोजगार मिल मजदूरों के परिवारों के लिए गवली ‘मसीहा’ या ‘रॉबिनहुड’ बन गया। उसके शूटर एक पंथ की तरह उसके प्रति वफादार रहते थे।
प्रमुख शूटर: विजय टंडेल, शरद बांडवे, तान्या कोली, विजय नारकर, अशोक जोशी और सुनील घाटे।
रावण कंपनी (अश्विन नाइक)
1996 में एनकाउंटर में अमर नाइक (रावण) के मारे जाने के बाद उसके भाई अश्विन नाइक ने जेल से कमान संभाली।
रणनीति: गवली गिरोह की तरह ही इसका आधार भी बेरोजगार मिल मजदूरों के बच्चे ही बने।
प्रमुख शूटर: रवींद्र फुपात, अनिल परब, जनार्दन परब, दशरथ रहाणे और बाबू चिकना।

अबू सलेम गैंग
1997 में डी-कंपनी से अलग होकर सलेम ने अपना अलग नेटवर्क बनाया।
रणनीति: सलेम अपने गृह जिले उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से बिना किसी क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले सीधे-साधे बेरोजगार लड़कों को मुंबई लाता था और उनसे वसूली न देने वाली फिल्मी हस्तियों व बिल्डरों पर गोलियां चलवाता था।
प्रमुख शूटर: सलीम हड्डी, दीपक सिंह, मेहंदी हसन और अब्दुल रज्जाक।
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मुंबई पुलिस का प्रहार और अंडरवर्ल्ड का पतन
अंडरवर्ल्ड के इस खूनी खेल को खत्म करने के लिए मुंबई पुलिस ने 90 के दशक के उत्तरार्ध में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स की टीम उतारी और ‘मकोका’ (MCOCA) जैसे कड़े कानून लागू किए। विदेश में बैठे आका तो बचते रहे, लेकिन ग्राउंड पर काम करने वाले शूटर या तो पुलिस एनकाउंटर में मारे गए या उम्रकैद की सलाखों के पीछे सड़ते रहे। नए शूटरों की भर्ती रुकने से मुंबई का अंडरवर्ल्ड पूरी तरह बिखर गया।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग और सोशल मीडिया का मायाजाल
समय के साथ अंडरवर्ल्ड का तरीका जरूर बदला है, लेकिन शूटर्स की नियति नहीं बदली। टाइगर श्रॉफ के मामले में भी यही देखा गया कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने चंद हजार रुपयों के लालच, फर्जी सोशल मीडिया पब्लिसिटी और विदेश में बसाने का झूठा सपना दिखाकर युवाओं को शूटिंग के काम में धकेला। इतिहास इस बात का गवाह है कि आका कोई भी हो, अपराध की दुनिया में शूटर सिर्फ एक डिस्पोजेबल मोहरा होता है, जिसका अंत या तो पुलिस की गोली होती है या फिर जेल की अंधेरी कोठरी।
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