रामायण और महाभारत दोनों युगों के साक्षी बने जो महान महापुरुष

Ramayana and Mahabharata
sanjay tiwari
आचार्य संजय तिवारी

इन्होंने त्रेता से द्वापर तक जीवित रह कर अनेक भूमिकाएं निभाई भी है। भारतीय काल गणना के अनुसार रामायण त्रेता युग में हुआ और महाभारत द्वापर युग के अंत में। दोनों के बीच लगभग 8 से 9 लाख वर्षों का अंतर माना जाता है। ऐसे में सामान्य मनुष्य दोनों कालों में जीवित नहीं रह सकता। जो दोनों कालों में रहे वे या तो चिरंजीवी हैं, या ऋषि हैं जिन्हें लंबी आयु का वरदान प्राप्त है।

इस अवधि में कई ऐसे दिव्य पुरुष महाभारत काल तक में अमनी बहुत गंभीर भूमिका में उपस्थित रहे हैं। इनके बारे में प्रत्येक सनातनी भारतीय को अवश्य जानना चाहिय। प्रमुख रूप से 8 ऐसे पात्र हैं जिनका वर्णन दोनों ग्रंथों में मिलता है।

1. हनुमान जी- अष्ट चिरंजीवीयों में प्रमुख

रामायण में तो हनुमान जी मुख्य पात्र ही हैं- राम के दूत, सीता की खोज, लंका दहन, लक्ष्मण के लिए संजीवनी लाना।

महाभारत में भी हनुमान जी की दो बार महत्वपूर्ण भूमिका है:

भीम से भेंट: वनवास के दौरान जब भीम को अहंकार हुआ कि मुझसे बलशाली कोई नहीं, तब रास्ते में एक बूढ़े वानर के रूप में हनुमान जी लेटे मिले। भीम उनकी पूंछ भी नहीं हटा पाया। तब हनुमान जी ने अपना विराट रूप दिखाया और भीम का अहंकार तोड़ा।

अर्जुन के रथ पर: महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे, इसीलिए अर्जुन के रथ को ‘कपिध्वज’ कहा जाता है। बिना हनुमान जी के वह रथ कभी भी भीष्म, कर्ण के दिव्यास्त्रों से बच नहीं पाता।

तुलसीदास जी ने इसीलिए लिखा- चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।

2. जामवंत- जिन्होंने राम को भी देखा और कृष्ण को भी

जामवंत जी भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। उनकी भूमिका हर युग में बहुत महत्वपूर्ण है। वह वस्तुतः ऋषि हैं। लोक भाषा ने उनको रिछ बना दिया। भालू बनकर उन्हें हर जगह प्रस्तुत किया गया। वस्तुतः वन में निर्धारित इन सभी के निवास के कारण सामान्य भाषा ने इन्हें बानर बना कर प्रस्तुत कर दिया।
ये जो रीछों के राजा कहे जाते हैं। इनका जन्म ब्रह्मा जी की जम्हाई से माना जाता है। वस्तुतः यह ऋषिकुल के सर्वश्रेष्ठ राजा है।

रामायण में

– जब समुद्र पार करने के लिए वानर सेना निराश थी, तब जामवंत ने ही हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाई थी – “का चुप साधि रहा बलवाना”। वे राम सेना के सबसे बुजुर्ग और बुद्धिमान मंत्री थे।

महाभारत काल में

यही जामवंत द्वापर में स्यमंतक मणि प्रसंग में आते हैं। श्रीकृष्ण पर मणि चोरी का आरोप लगा तो कृष्ण जंगल में खोजते हुए जामवंत की गुफा में पहुंचे। जामवंत और कृष्ण में 28 दिन तक युद्ध हुआ। अंत में जामवंत पहचान गए कि ये मेरे प्रभु राम ही हैं, तब उन्होंने अपनी पुत्री जामवंती का विवाह कृष्ण से कर दिया और मणि लौटा दी।

3. परशुराम जी- दो अवतारों के गुरु

भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी चिरंजीवी हैं।

रामायण में: सीता स्वयंवर में जब राम ने शिव धनुष तोड़ा तो परशुराम जी क्रोधित होकर आए। लक्ष्मण से उनका तीखा संवाद हुआ। अंत में राम ने उनके विष्णु धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उन्हें शांत किया और परशुराम जी तपस्या के लिए महेंद्र पर्वत चले गए।

महाभारत में: वे भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण- तीनों के गुरु हैं। भीष्म को उन्होंने शस्त्र विद्या सिखाई। कर्ण को भी उन्होंने ही ब्रह्मास्त्र दिया था, पर झूठ बोलने पर श्राप भी दिया कि युद्ध में विद्या भूल जाएगा। महाभारत में वे कई बार शांति दूत के रूप में भी आते हैं।

4. विभीषण जी- लंका के चिरंजीवी राजा

रावण के भाई विभीषण को राम ने अजर-अमर होने का और लंका का राज्य दिया था।

रामायण में वे राम के पक्ष में आए और रावण वध के बाद लंका के राजा बने।

महाभारत में जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया तो चारों पांडव दिग्विजय के लिए निकले। सहदेव दक्षिण दिशा में लंका तक गए। वहां विभीषण ने सहदेव का स्वागत किया और यज्ञ के लिए कर और उपहार भेजे। सभा पर्व में इसका उल्लेख है।

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5. महर्षि मार्कण्डेय- जिन्होंने प्रलय देखा

मार्कण्डेय ऋषि को 16 वर्ष की आयु में मृत्यु का वरदान था, पर शिव कृपा से वे चिरंजीवी हो गए।

रामायण में उनका उल्लेख कम है पर पुराणों में कहा गया है कि उन्होंने राम का दर्शन किया था।

महाभारत में वन पर्व में जब पांडव वन में थे, तब मार्कण्डेय ऋषि उनके पास आए और उन्हें रामायण की पूरी कथा सुनाई। जिसे ‘रामोपाख्यान’ कहा जाता है। उन्होंने युधिष्ठिर को समझाया कि जैसे राम ने वनवास में दुख सहा, वैसे ही तुम भी सहो, अंत में विजय तुम्हारी होगी।

6. मयासुर- लंका और इंद्रप्रस्थ दोनों का वास्तुकार

मयासुर रावण के ससुर और महान शिल्पकार थे।

रामायण में उन्होंने रावण के लिए सोने की लंका बनाई थी।
महाभारत में खांडव वन दहन के समय अर्जुन ने मयासुर की जान बचाई थी। बदले में मयासुर ने पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ में अद्भुत माया महल बनाया, जिसे देखकर दुर्योधन भ्रमित हो गया और द्रौपदी ने हंसा – “अंधे का पुत्र अंधा”। वहीं से महाभारत की नींव पड़ी।

7. नारद मुनि

नारद जी तो तीनों लोकों में विचरण करते हैं।

-रामायण की प्रेरणा: वाल्मीकि रामायण की शुरुआत ही नारद जी से होती है। वाल्मीकि जी ने नारद जी से पूछा – इस संसार में सबसे गुणवान कौन है? तब नारद जी ने राम के गुण बताए और वाल्मीकि जी ने रामायण लिखी।

महाभारत में: वे कई बार पांडवों को सलाह देने आते हैं, कंस को कृष्ण के जन्म की सूचना भी उन्होंने ही दी थी।

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चिरंजीवी श्लोक

शास्त्रों में 8 चिरंजीवियों का श्लोक है:

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमानश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:॥

इसमें से हनुमान, विभीषण, परशुराम और कृपाचार्य रामायण और महाभारत दोनों काल में उपस्थित थे। अश्वत्थामा महाभारत में पैदा हुए पर कलियुग तक जीवित हैं।

इन पात्रों का दोनों युगों में होना केवल कथा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का एक गहरा संदेश है- धर्म एक ही है, चाहे त्रेता हो या द्वापर। राम भी उसी धर्म के लिए लड़े, कृष्ण ने भी उसी धर्म की स्थापना के लिए गीता सुनाई।

(लेखक संस्कृति पर्व पत्रिका के संपादक हैं।)

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