अरबिन्द शर्मा अजनवी
अरबिन्द शर्मा अजनवी

पता नही क्यूं! आजकल,
तुम्हारी याद आ रही है।
ना चहते हुए भी,
तेरी याद, दिला रही है।।

साथ खेलना, साथ घूमना,
एक साथ स्कूल जाना।
तेरा रूठना मेरा मनाना,
ना मानने पर, अपनी क़सम खिलाना।।

अब ग़लती ना होगी,
ये कह कर, माफ़ी मांगना!

बचपन के वो पल, कितने हंसीन थे,
न कोई चिन्ता, न डर था।
एक दुसरे के लिये,
मन में अटूट प्रेम था।।

स्कूल जाते समय हर रोज़,
खड़े रहते थे, एक दूसरे के,
इंतज़ार में।

ना धूप, ना बरसात,
ना ठन्ड का आभास रहता।
इन नज़रों को बस, एक दूसरे का
इन्तज़ार रहता!

अपलक, देखता रहता था
तेरे राह में
बड़ी ख़ुशी मिलती थी!
तेरे इन्तज़ार में।

स्कूल से कॉलेज तक का सफ़र, बीत गया! पता नहीं चला,
कॉलेज का आख़िरी साल था,
अब हम दूर होने वाले थे।

कभी सोचे भी नहीं थे,
की हम जुदा हो जायेंगे,
जुदाई क्या होती है!
शायद, हम जाने भी नहीं होंगे।।

पहली बार हम दोनों,
खूब! रोये थे, एक दूसरे को
गले लगा कर।
हम दूर हो जायेंगे,
जुदाई क्या होती है! ये जान कर।।

हम दूर हो गये, एक दुसरे से,
कब मिलेंगे, ये भी पता न था
समय बीतता गया,
वक़्त ने यादों को भूला दिया।।

लेकीन पता नहीं क्यूं
ये वक़्त आज फिर
तेरी याद दिला रही है
सच बताऊँ!
तुम्हारी याद बहुत आ रही है।।

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