2027 के चुनावी रण में अखिलेश की नीली सेना

समाजवादी पार्टी की छात्रसभा के कार्यकर्ताओं की नीली वर्दी में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस को महज संगठनात्मक कवायद मानना राजनीतिक संकेतों की भाषा को नजरअंदाज करना होगा। अखिलेश यादव की यह ‘ब्लू ब्रिगेड’ दरअसल उत्तर प्रदेश की उस राजनीतिक जमीन पर दस्तक है, जिसे लंबे समय तक कांशीराम और मायावती की बहुजन राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है। नीला रंग आंबेडकर, संविधान और दलित अस्मिता का प्रतीक है। ऐसे में सपा का नीले रंग को अपने युवा संगठन की पहचान बनाना 2027 के लिए तैयार किए जा रहे पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण का स्पष्ट राजनीतिक संकेत है।
उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का इतिहास बताता है कि यह प्रयोग कितना महत्वपूर्ण और जोखिम भरा है। कांशीराम ने 1980 के दशक में बहुजन आंदोलन के जरिए दलितों को यह अहसास कराया कि उनकी राजनीतिक शक्ति केवल वोट देने में नहीं, सत्ता की दिशा तय करने में है। बहुजन समाज पार्टी इसी विचार की राजनीतिक अभिव्यक्ति बनी और मायावती उसके सबसे प्रभावशाली चेहरे के रूप में सामने आईं।
1991 में भाजपा 221 सीटों के साथ उत्तर प्रदेश में सत्ता तक पहुंची थी और बसपा केवल 12 सीटों पर थी। लेकिन 1993 में सामाजिक समीकरण ने करवट ली। भाजपा 177 सीटों पर रह गई, जबकि समाजवादी पार्टी को 109 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का गठजोड़ सत्ता में आया। यह गठबंधन पिछड़े और दलित मतों की वह राजनीतिक एकता था जिसने मंडल बनाम कमंडल के दौर में भाजपा की चुनौती को रोक दिया। 1995 का लखनऊ गेस्ट हाउस कांड इस रिश्ते के टूटने का प्रतीक बना और दोनों दलों के बीच ऐसी राजनीतिक खाई बनी जो वर्षों तक नहीं भरी।
मायावती ने इसके बाद अलग राह चुनी और 2007 में बसपा ने सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे 403 में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। यह वह क्षण था जब दलित नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश में सत्ता पर अपना स्वतंत्र दावा सबसे मजबूती से साबित किया। मगर इसके बाद बसपा का चुनावी ग्राफ लगातार गिरता गया- 2012 में 80, 2017 में 19 और 2022 में सिर्फ एक विधानसभा सीट। जिस पार्टी ने 2007 में अकेले बहुमत हासिल किया था, उसका यह पतन उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में पैदा हुई बड़ी राजनीतिक रिक्तता का संकेत है।

अखिलेश यादव इसी रिक्तता को भरने की कोशिश कर रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 33 पर सिमट गई। कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। परिणाम ने अखिलेश को यह भरोसा दिया कि यादव-मुस्लिम के पारंपरिक आधार से आगे बढ़कर पीडीए का सामाजिक गठबंधन भाजपा को प्रभावी चुनौती दे सकता है। अब 2027 में इसी प्रयोग को विधानसभा की 403 सीटों पर उतारने की तैयारी है।
यही कारण है कि भाजपा और बसपा दोनों के लिए अखिलेश की नीली राजनीति महज चुनावी गतिविधि नहीं है। भाजपा को अपने दलित और गैर-यादव पिछड़े सामाजिक आधार को मजबूत बनाए रखना है, जबकि बसपा को अपने मूल दलित मतदाता को फिर से सक्रिय करना है। कांशीराम की विरासत पर सभी का दावा इसी बदलते राजनीतिक समीकरण का प्रमाण है।
हालांकि अखिलेश की राह आसान नहीं है। दलित मतदाता को केवल नीली टी-शर्ट या पीडीए के नारे से आकर्षित नहीं किया जा सकता। उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संगठन में हिस्सेदारी, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और संविधान-आरक्षण जैसे सवालों पर ठोस भरोसा चाहिए। सपा यदि दलितों को केवल बसपा के कमजोर होते वोट बैंक के रूप में देखेगी तो यह रणनीति सीमित रह जाएगी; उसे उन्हें सत्ता और संगठन में वास्तविक भागीदार बनाना होगा।
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यहीं 2027 की लड़ाई दिलचस्प हो जाती है। भाजपा अपने सामाजिक गठजोड़ को बचाने में जुटी है, बसपा अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है और सपा नीले रंग के सहारे पीडीए की नई सामाजिक इबारत लिखना चाहती है। तीनों की मंजिल एक ही है- दलित मतदाता।
कांशीराम ने बहुजन समाज को सत्ता की चाबी हासिल करने का सपना दिखाया था। मायावती ने उस चाबी से लखनऊ की सत्ता का दरवाजा खोला था। अब अखिलेश यादव उसी चाबी पर अपना दावा ठोक रहे हैं। 2027 में फैसला केवल यह नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी; फैसला यह भी होगा कि कांशीराम की राजनीतिक विरासत का अगला वारिस कौन बनेगा। नीला रंग पहन लेना आसान है, लेकिन नीले मतदाता का भरोसा जीतना, यही अखिलेश की असली अग्निपरीक्षा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
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