तसलीमा नसरीन का बांग्लादेश पर तीखा प्रहार, बोलीं- मदरसों से सिर्फ जिहादी पैदा होते हैं
कोलकाता: बांग्लादेशी मूल की प्रसिद्ध और चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन ने रविवार को कोलकाता में मीडिया से बातचीत करते हुए पड़ोसी देश बांग्लादेश के मौजूदा हालात और महिलाओं के अधिकारों पर बेबाक बयान दिया। एक तरफ जहाँ उन्होंने मदरसा शिक्षा को पूरी तरह गैर-जरूरी बताते हुए उसे कट्टरता की जननी करार दिया, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं) की दयनीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की।
मदरसों को सेक्युलर स्कूलों में बदला जाए
पत्रकारों द्वारा मदरसा शिक्षा को लेकर पूछे गए सवाल पर तसलीमा नसरीन ने सख्त लहजा अपनाते हुए कहा कि आज के दौर में मदरसों की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संस्थानों से केवल जिहादी विचारधारा ही पनपती है। उन्होंने मांग की कि सभी मदरसों को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) स्कूलों में तब्दील कर दिया जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी को सही दिशा मिल सके।
बांग्लादेश में हिंदुओं और महिलाओं के अधिकारों पर संकट
लेखिका ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बेगम खालिदा जिया और मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में हिंदुओं को प्रताड़ित किया गया है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के पास कोई बुनियादी अधिकार नहीं हैं, यहाँ तक कि उन्हें पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का हक भी नहीं मिलता। उन्होंने मांग की कि वहां 1956 का हिंदू एक्ट और यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू होना चाहिए ताकि महिलाओं को समानता और अधिकार मिल सकें।
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एक देश, एक कानून समय की मांग
तसलीमा नसरीन ने एक देश, एक कानून की वकालत करते हुए कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए पूरे देश में एक समान कानून होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में भी यूसीसी लागू किया जाना चाहिए, जिससे महिलाओं को उनका वाजिब हक मिल सके। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि बांग्लादेश में आज भी खुले विचारों वाले और प्रगतिशील लोग देश छोड़ने को मजबूर हैं।
19 साल बाद कोलकाता वापसी पर सरकार को दिया श्रेय
लंबे अंतराल के बाद कोलकाता आने पर खुशी जताते हुए तसलीमा नसरीन ने बताया कि लगभग 19 वर्षों के बाद उन्हें यहाँ आने का अवसर मिला है। उन्होंने पुरानी राज्य सरकारों पर तंज कसते हुए कहा कि पिछली दो सरकारों के दौर में उन्हें बंगाल से निर्वासित रखा गया था। अब व्यवस्था और सरकार बदलने के बाद ही उन्हें कोलकाता में दोबारा प्रवेश करने की अनुमति मिल सकी है।
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