Defection in Politics
Acharya Shrihari
आचार्य श्रीहरि

छोटे दलों की शामत आयी क्यों? इनके सांसद, विधायक भाग क्यों रहे हैं? शुरू करते हैं ममता बनर्जी की राजनीतिक दुर्गति से, थोड़े समय पहले तक राजनीति में उसकी तूती बोलती थी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि न्यायापालिका तक को धत्ता बता देती थीं। सरकारी और न्यायपालिका के प्रोटोकॉल को भी लात मार देती थीं। सीबीआई और ईडी के अधिकारियों को भी बंधक बना देती थीं। इनसे लूटकर भ्रष्टाचार, कदाचार के कागजात छीन ले जाती थीं। जैसे ही ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में हार हुई, सत्ता हाथ से बाहर हुई वैसे ही ममता बनर्जी की स्थिति राजनीतिक तौर पर मरणासन्न की तरह हो गई। उस बूढ़ी शेरनी की तरह हो गई जो भूख प्यास के कारण शारीरिक तौर पर जर्जर, असहाय होकर शिकार करने में असमर्थ हो जाती है। जिनके पंजों में शिकार करने की शक्ति ही नहीं रही। उनकी पार्टी टूट गई, बीजेपी की गोद में ममता बनर्जी के सांसद और विधायक बैठ कर खेलने लगे।

अब ममता बनर्जी का चुनाव चिन्ह सुरक्षित रहेगा या नहीं, यह चुनाव आयोग की मर्जी पर निर्भर है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी मदद के बदले टीएमसी को कांग्रेस में विलय करने का अपमान जनक फरमान सुना देते हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी पहले ही टूट चुकी थी, असली शिवसेना एकनाथ शिंदे के पास है। अब फिर से शिवसेना उद्धव गुट में टूट हो रही है, उसके छह सांसद बागी हो गए। बीजेपी में शामिल होने के लिए तैयार थे, लेकिन बीजेपी ने रणनीति गत इन्हें शामिल नहीं कराया और शिंदे गुट में शामिल होने के लिए कह दिया। अब उद्धव ठाकरे कह रहे हैं कि उनसे गलती हुई है। उन्होंने गलत लोगों को टिकट दिया और गलत लोगों को सांसद बनाया।

हम फिर से जनता के बीच जाएंगे और बीजेपी के साथ ही साथ बागी सांसदों को बेनकाब करेंगे। उन्हें जनता से सजा दिलाएंगे। पर तत्काल यह अवसर प्राप्त होने वाला नहीं है, क्योंकि तकनीकी तौर इन सभी की सदस्यता बची रहेगी। क्योंकि दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्यता इनके पास है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोकसभा अध्यक्ष की भी कृपा इनके साथ रहेगी। इधर अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को लेकर भी बुरी खबर आई और आशंका व्यक्त की गई कि अखिलेश यादव की पार्टी टूटने वाली है, उसके दो तिहाई सांसद बीजेपी में शामिल होने वाले हैं। लेकिन बीजेपी कोई जल्दीबाजी में नहीं है। उत्तर प्रदेश में उसे इसकी जरूरत तत्काल है नहीं। अगर महिला आरक्षण विधेयक बीजेपी फिर से पास कराने की नीति अपनायेगी तो फिर अखिलेश यादव की पार्टी को तोड़ने पर बीजेपी विचार कर सकती है, जिसमें बीजेपी को सफलता भी मिल सकती है।

अरविन्द केजरीवाल के आधा दर्जन सांसद बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। द्रमुक और बीजेपी में भी नजदीकियां बढ़ रही है, द्रमुक अब अपनी हैसियत और अस्तित्व बचाने के लिए बीजेपी की ओर देख रही है। जोसेफ विजय की बाज दृष्टि से बचने के लिए स्टालिन को बीजेपी का सहारा चाहिए। झारखंड में बीजेपी ने समर्थन बल नहीं होने के बाद भी करिश्मा कर दिखाया। झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर बीजेपी ने राज्यसभा चुनावों में अपने समर्थित उम्मीदवार को जीता लिया।

भारतीय राजनीति की यह बगावत, टूट-फूट, और विश्वासघात को किस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए? क्या इसके लिए सिर्फ बीजेपी और नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार माना जाना चाहिए? क्या बीजेपी अपने विशाल स्वीकार्यता की शक्ति का दुरुपयोग कर रही है। क्या नरेन्द मोदी अपनी केंद्रीय सरकार की शक्ति को एक हथकंडा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या सही में बीजेपी दूसरे दलों के सांसदों और विधायकों को तोड़ने-फोड़ने के लिए करोड़ों और अरबों रुपये खर्च कर रही है? क्या बीजेपी छोटे दलों के सांसदों और विधायकों को तोड़ने के लिए सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग कर रही है।

सीबीआई और ईडी के डर से विपक्षी पार्टियां के लोग बीजेपी में शामिल होने के लिए बाध्य हैं? क्या चुनाव आयोग और कोर्ट भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संरक्षण दे रहे हैं? क्या विपक्षी पार्टियां की आंतरिक स्थिति इसके पीछे खलनायकी भूमिका नहीं निभाती है? क्या विपक्षी पार्टियां की अराजकता और निरंकुशता इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या छोटे दलों के अंदर नैतिकताहीन उम्मीदवार चयन प्रक्रिया दोषी नहीं है? पैसे लेकर टिकट बाटो, बेचो की परिपाटी जिम्मेदार नहीं है? क्या हम यह मान ले कि भारतीय राजनीति से अब शुचिता और नैतिकता का पतन हो चुका है। लोकतंत्र की आत्मा मर चुकी है। अब भारतीय राजनीति सेवा कर्म का नहीं बल्कि पैसा कमाओ का जरिया और प्रतीक बन गई है।

राजनीति ह्रास की ओर लुढ़क रही है, घोर पतन की ओर जा रही है, गिरने की सारी हदें पार कर रही है। जीत के लिए शुचिता और नैतिकता के सारे मापदंड तोड़े जा रहे हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावते सच हो रही है। सभी पार्टियां इस रंग में रंगी हुई है, देश की दो बड़ी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस इससे अक्षुति भी नहीं है। पर छोटे दलों में यह स्थिति बहुत ही खतरनाक और नाजुक है। भारत में तीन प्रकार की छोटी पार्टियां है। पहली वंशवादी, दूसरी जातिवादी और तीसरी क्षेत्रवादी पार्टियां है। अखिलेश यादव की सपा, मायावती की बसपा, लालू यादव का राजद जातिवादी तो फिर स्टालिन की द्रमुक, ममता बनर्जी की तृणमूल, अकाली दल क्षेत्रीय पार्टी है।

ये वंशवादी भी है, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, द्रमुक, राजद आदि पार्टियों का प्रमुख होने की योग्यता सिर्फ वंशवादी होती है। वंशवादी आधार पर लालू का बेटा तेजस्वी यादव राजद का चीफ हो गया, यही कहानी अखिलेश यादव और स्टालिन आदि का है। ये सभी पार्टियां वन मेन शो की तरह काम करती है, जहाँ पर इन पार्टियों के चीफ का कथन ही मान्य होता है। चीफ के आदेश की अवहेलना की बात सोची तक नहीं जाती है।

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय? कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत है। प्रशांत किशोर पर मिलने के इच्छुक कार्यकर्ताओं को पैसे देने होंगे जैसे कथित आरोप लगे थे। सोशल मीडिया पर इस तरह की खबरें आम थी। अभी-अभी यह खबर आई है कि मायावती सामान्य मुलाकात के लिए दो लाख लेती हैं, जबकि विशेष मुलाकात के लिए पांच लाख लेती हैं। खास कर चुनाव के समय यह बात जोरदार ढंग से उठती है कि पैसे लेकर टिकट बाटें गए है। पैसे के बल पर उम्मीदवारी खरीदी गई है। जब चोर, गुंडे, व्यापारी, ठेकेदार, अफसर और प्रोफेशनल, उद्योगपति पार्टियों को प्रभावित कर उम्मीदवार बन जाते हैं, तब साफ हो जाता है कि टिकट बेचा गया। उम्मीदवार चयन प्रक्रिया का कोई अतित्व नहीं था।

उदाहरण के लिए शत्रुध्न सिन्हा को ले लीजिए। शत्रुघ्न सिन्हा बीजेपी और कांग्रेस से विश्वासघात कर हाशिए पर थे। ममता बनर्जी ने गले लगा लिया और उसे संसद में भेज दिया। अब शत्रुघ्न सिन्हा ममता बनर्जी के साथ विश्वास घात कर मोदी और बीजेपी का गुणगान करने लगा। गलती तो ममता बनर्जी की ही मानी जाएगी। संघर्ष और समर्पण हीन राघव चड्ढा को अरविंद केजरीवाल ने पहले विधायक और फिर संसद सदस्य बना दिया। दुष्परिणाम सामने है, राघव चड्ढा बीजेपी का आईकन बन गया।

राजनीति में निवेश करने वाला अधिकतम लाभ अर्जित करना चाहता है, विपक्ष में बैठकर वह अधिकतम लाभ अर्जित नहीं कर सकता। वह सत्ता पक्ष में बैठकर अधिकतम लाभ अर्जित कर सकता है। यही कारण है कि छोटे दलों के सांसदों और विधायकों की पसंद बीजेपी बन रही है। मोदी है तो जीत की गारंटी है, यह विश्वास और शक्ति भी छोटे दलों के सांसदों और विधायकों को तोड़ने-फोड़ने में काम आती है।

बीजेपी के लिए भी एक संदेश है, एक चेतावनी है, एक आत्मघात का फंदा है। अनैतिक, शुचिता हीन, चोर, उच्चके, गुंडे, व्यापारी ठेकेदार अफसर और प्रोफेशनल उद्योगपति किसी के नहीं होते हैं। ये विचार से बंधे नहीं होते हैं। ये संप्रभुता से बंधे नहीं होते हैं, ये सिर्फ सत्ता और पैसे से बंधे होते हैं। यशवंत सिन्हा और सतपाल मलिक का उदाहरण याद करना चाहिए। हजारीबाग लोकसभा सीट से जमानत तक नहीं बचा पाने वाले यशवंत सिन्हा बीजेपी में शामिल होकर वित्त मंत्री बन गए। उन्हें अटल आडवाणी सरीखा होने का अंहकार हो गया। बेटे को अपनी जगह टिकट दिलाने के बाद भी अपने लिये बड़ा पद का भी अंहकार भर लिया।

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मोदी को ही चुनौती दे डाली, बीजेपी का संहार करने की कसमें खाने लगे। बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव लड़ गए। सतपाल मलिक प्रकरण कितना जहरीला है, कितना लोमहर्षक है, यह भी सर्वविदित है। कांग्रेस और समाजवादी पृष्ठभूमि के सतपाल मलिक को बीजेपी ने राज्यपाल बना दिया। दुष्परिणाम क्या निकला? सतपाल मलिक भस्मासुर बन गया, उसकी पाकिस्तान की भाषा खूब कुचर्चित हुई थी। नरेंद्र मोदी पर ही भारतीय सैनिकों को मरवाने के आरोप लगाने लगे। नरेंद्र मोदी को भ्रष्ट और किसान विरोधी कहने लगे। सतपाल मलिक को राज्यपाल पद से हटाने की हिम्मत भी मोदी नहीं कर सके थे। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ प्रकरण भी कुख्यात है। जगदीप धनखड़ को सीधे इस्तीफा लेकर संकट टाला गया था। बीजेपी की सत्ता संहार होते ही ऐसे लोगों के लिए फिर से बीजेपी अछूत बन जाएगी, बीजेपी फिर से सांप्रदायिक बन जाएगी।

छोटे दलों की राष्ट्रीय भूमिका और परिपेक्ष्य शून्य है, अपने क्षेत्र, समर्थन समूह से ये बाहर नहीं निकलते हैं। खंडित जनादेश में तो इनकी भूमिका और स्वीकार्यता तो होती है पर बहुमत जनादेश में इनकी भूमिका हाशिए पर खड़ी हो जाती है, ये परजीवी बन जाते हैं। छोटे दलों को भी बड़ा बनाना चाहिए। अपनी राष्ट्रीय भूमिका रेखांकित करनी चाहिए। अपनी उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को तंदरुस्त बनाना चाहिए। नहीं तो फिर इसी तरह आपने सांसद, विधायकों के विश्वास घात का शिकार बनते रहेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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