विकास की अंधी दौड़ और सुपर एल नीनो ने देश को बनाया हीट ट्रैप, तप रहे हैं उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य

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Newschuski Digital Desk: भारत इस समय एक बेहद डरावने और आत्मघाती विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां देश का पारा हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच रिकॉर्ड स्तर पर जंगलों और पेड़ों का सफाया किया जा रहा है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में अधिकांश भारत के हैं, और चिंता की बात यह है कि इनमें से 40 से अधिक शहर अकेले उत्तर प्रदेश के हैं।

तमिलनाडु के कोविलंगुलम में पारा 49.6 डिग्री सेल्सियस, यूपी के बांदा में 48.2 डिग्री और मध्य प्रदेश के खजुराहो में 47.4 डिग्री तक पहुंच जाना महज एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि एक मानव-निर्मित ‘हीट इकोनॉमी’ का अलार्म है। सवाल विकास के विरोध का नहीं, बल्कि अस्तित्व की उस बुनियाद का है जिसे हम अपने हाथों से उजाड़ रहे हैं।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल एल नीनो (El Nino) का प्रभाव उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंचने की आशंका है, जो आगे चलकर सुपर एल नीनो का रूप ले सकता है। इतिहास गवाह है कि 1877 का भीषण अकाल और 1997-98 की तबाही इसी सुपर एल नीनो की देन थी, जिसने प्राकृतिक आपदा को मानवीय त्रासदी में बदल दिया था। लेकिन आज भारत में हीटवेव केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि लचर नीतियों और प्रशासनिक विफलता का परिणाम बन चुकी है।

ग्रेट निकोबार परियोजना का उदाहरण देते हुए लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी हाल ही में सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कैंपबेल बे में ‘विकास’ के नाम पर 160 वर्ग किलोमीटर में फैले सदियों पुराने वर्षावनों (रेनफॉरेस्ट) को उजाड़ा जा रहा है, जो लाखों पेड़ों की हत्या और जनजातीय विरासत के खिलाफ एक गंभीर अपराध है। उनके शब्दों में, यह विकास नहीं, बल्कि विकास की भाषा में लिपटा विनाश है।

मेट्रो, रेलवे और एक्सप्रेसवे की भेंट चढ़ती हरियाली

आधुनिक दुनिया के इतिहास में विकसित सभ्यताओं ने शहरीकरण के साथ-साथ अपने पर्यावरण को सहेजा, लेकिन भारत में पेड़ों को अक्सर बुनियादी ढांचे के निर्माण में एक अड़चन मान लिया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कत्लेआम का शिकार हुए पेड़ों के आंकड़े डराने वाले हैं।

दिल्ली (बिजवासन रेल टर्मिनल): 1,279 पेड़ों की बलि।

बेंगलुरु (मेट्रो विस्तार): 6,800 से अधिक पेड़ काटे गए।

मुंबई (कोस्टल रोड प्रोजेक्ट): 46,000 से ज्यादा मैंग्रोव (तटीय वन) नष्ट।

उत्तर प्रदेश (कांवड़ मार्ग): करीब 17,000 पेड़ों को काटने की मंजूरी।

मध्य प्रदेश (चोरल रेलवे लाइन): 5 लाख पेड़ों को काटने का प्रस्ताव।

अरुणाचल प्रदेश (मेगा प्रोजेक्ट): 23 लाख पेड़ों की संभावित कटाई।

यह तबाही सिर्फ पेड़ों की संख्या तक सीमित नहीं है। इन जंगलों के साथ क्लाउडेड लेपर्ड, हूलॉक गिबन, पेंगोलिन, टाइगर और किंग कोबरा जैसे दुर्लभ जीवों का पूरा पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) और जमीन के नीचे का माइकोराइजा नेटवर्क (जो पेड़ों को आपस में जोड़ता है) हमेशा के लिए दफन हो जाता है।

क्या है अर्बन हीट आइलैंड का जानलेवा प्रभाव

वैज्ञानिकों का कहना है कि पेड़ न होने से भारतीय शहर अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island Effect) में तब्दील हो चुके हैं। कंक्रीट की इमारतें और डामर की सड़कें दिनभर सूरज की तपिश को सोखती हैं और रात में उसे वापस वातावरण में छोड़ती हैं, जिससे शहरी इलाकों का तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री बढ़ जाता है। पेड़ अपनी छाया और वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) से हवा को ठंडा रखते हैं, लेकिन उन्हें हटाने से एसी (AC) की मांग बढ़ती है, जो बदले में बिजली की खपत और कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाकर इस दुष्चक्र को और खतरनाक बना देती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, जैव विविधता का यह नुकसान सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। इसका सबसे घातक शिकार शहरों के गरीब, बुजुर्ग, बच्चे और फुटपाथ या झुग्गियों में रहने वाले हाशिए के समुदाय बन रहे हैं, जिनके पास गर्मी से बचने के संसाधन नहीं हैं।

कागजी हरियाली और प्रतिपूरक पौधारोपण का भ्रम

जब भी किसी बड़े प्रोजेक्ट के लिए जंगल काटे जाते हैं, तो सरकारें ‘प्रतिपूरक पौधारोपण’ (Compensatory Afforestation) का तर्क देती हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि यह समाधान कम और छलावा ज्यादा है। सैकड़ों साल पुराने एक विशालकाय बरगद या पीपल के पेड़ की जगह लगाए गए दस छोटे पौधे कभी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। नया पौधा न तो उतनी छाया दे सकता है, न कार्बन सोख सकता है और न ही उस जैविक विविधता को वापस ला सकता है। ऊपर से हकीकत यह भी है कि रोपे गए अधिकांश पौधे उचित देखभाल के अभाव में दम तोड़ देते हैं।

गंभीर बात यह है कि पिछले 12 वर्षों में नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ द्वारा 97% परियोजनाओं को बिना किसी रोक-टोक के हरी झंडी देना यह साबित करता है कि पर्यावरणीय मंजूरियां अब सिर्फ एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गई हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए पेड़ों की अवैध कटाई को “मानव हत्या से भी बदतर” बताया है, लेकिन बड़े प्रोजेक्ट्स के सामने न्यायपालिका का संतुलन भी अक्सर विकास के पक्ष में झुक जाता है। सरकारी रिपोर्टें भले ही दावा करें कि देश का ‘ग्रीन कवर’ बढ़ रहा है, लेकिन विशेषज्ञ इसे खारिज करते हैं। सरकार व्यावसायिक बागानों, बांस की खेती और खेतों को भी ‘वन क्षेत्र’ (Forest Cover) में गिन लेती है, जबकि असलियत में हमारे प्राकृतिक और घने जंगल तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

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बड़ा सवाल, क्या शहर रहने लायक बचेंगे

अब वक्त आ गया है जब भारत को अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा। हमें पेड़ों को अड़चन नहीं बल्कि लिविंग इंफ्रास्ट्रक्चर मानना होगा। देश के संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में नो-गो ज़ोन (जहां निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित हो) तय करने होंगे और पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना होगा। यदि विनाश की यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले समय में सवाल यह नहीं होगा कि हमारे पास कितनी ऊंची इमारतें या कितने चौड़े एक्सप्रेसवे हैं, बल्कि सवाल यह होगा कि क्या हमारे शहर इंसानों के जीवित रहने लायक भी बचे हैं?

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