नारद जी का हर संवाद लोकमंगल के लिए, राष्ट्रवादी पत्रकारिता में स्व का बोध जरूरी’: प्रो. संजय द्विवेदी
Kanpur News: कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) में देवर्षि नारद जयंती के पावन अवसर पर एक विशेष ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पत्रकारिता के आदर्शों, मूल्यों और राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका पर गहन मंथन हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने शिरकत की, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने की।
लोकमंगल के संवाहक हैं नारद जी
प्रो. संजय द्विवेदी ने देवर्षि नारद की लोक छवि और उनके वास्तविक व्यक्तित्व के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी छवि अक्सर विवाद सुलझाने या कलह पैदा करने वाले व्यक्ति की बनाई गई है, जो सच्चाई से कोसों दूर है. उन्होंने जोर दिया कि नारद जी के प्रत्येक संवाद के पीछे लोकमंगल और समाज कल्याण की भावना छिपी होती है।
वे देवताओं, राक्षसों और समाज के हर वर्ग के बीच समान रूप से विश्वसनीय हैं और सबके मित्र, आचार्य व मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। नारद जी ने कभी कोई मठ या आश्रम नहीं बनाया, वे निरंतर प्रवास और संवाद के जरिए समाज हित में संचार करते रहे। प्रो. द्विवेदी के अनुसार विश्वसनीयता, सतत प्रवास और उद्देश्य की पवित्रता ही एक सफल पत्रकार के तीन अनिवार्य गुण हैं।
राष्ट्र विकास के लिए ‘स्व’ का बोध अनिवार्य: प्रो. विनय कुमार पाठक
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में देवर्षि नारद को भारतीय परंपरा का ‘प्रथम पत्रकार’ बताया. उन्होंने कहा कि नारद जी ने हमेशा सत्य और जनहित को सर्वोपरि रखा, जो आज के पत्रकारों के लिए प्रेरणा है। अपनी संस्कृति और कर्तव्यों का शाश्वत परिचय ही ‘स्व’ का बोध है। राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए नागरिकों और पत्रकारों में ‘स्व’ का बोध होना नितांत आवश्यक है।
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व्याख्यान के दौरान विभाग के अन्य विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए। विभागाध्यक्ष डॉ. दिवाकर अवस्थी ने कहा कि सूचना की गति से अधिक उसकी सत्यता और पवित्र उद्देश्य महत्वपूर्ण है। संयोजक डॉ. हरिओम कुमार ने वैश्विक स्तर पर संवाद के लिए नारद संचार मॉडल को स्थापित करने की वकालत की। इसी क्रम में डॉ. ओम शंकर गुप्ता ने छात्रों को मीडिया जगत के मार्गदर्शक स्तंभ के रूप में नारद जी की कार्यशैली का अध्ययन करने की सलाह दी।
कार्यक्रम का समापन सह आचार्य डॉ. योगेंद्र कुमार पांडेय के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस ऑनलाइन संगोष्ठी में विभाग के शिक्षक डॉ. जितेंद्र डबराल, प्रेम किशोर शुक्ला, सागर कनौजिया समेत बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं सम्मिलित हुए।
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