समुद्र की लहरों को चरणों में समेटे है मुरुदेश्वर का अद्भुत शिव मंदिर, जानें क्या है इतिहास

murudeshwar shiv mandir

Newschuski Digital Desk: कहा जाता है कि ब्रह्मांड के हर कण में भगवान शिव वास करते हैं। दुनिया के कोने-कोने में उनके मंदिर और उनके भक्त मिल जाएंगे। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे अद्भुत शिव मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां स्वयं अरब सागर की लहरें भोलेनाथ के चरण छूने के लिए आती हैं। यह है कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में स्थित मुरुदेश्वर शिव मंदिर।

यह मंदिर कंदुका गिरि नामक पहाड़ी पर समुद्र के किनारे बना हुआ है, और इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। यहां स्थित 123 फुट ऊंची शिव प्रतिमा दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची शिव प्रतिमा है। जब समुद्र की लहरें उठती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे सच में भगवान के चरण स्पर्श कर रही हों। इसी अद्भुत नज़ारे और भव्यता के कारण यह स्थान एक मशहूर तीर्थ और पर्यटन स्थल बन गया है। भक्त पहले मुख्य मंदिर में दर्शन करते हैं और फिर इस विशाल प्रतिमा तक पहुंचते हैं।

मंदिर की अनोखी विशेषताएं

भव्य गोपुरम: इस मंदिर का गोपुरम (मुख्य द्वार) 20 मंजिला है और यह अपने आप में एक कलात्मक कृति है। इस पर रामायण, महाभारत के पात्रों और देवी-देवताओं की मूर्तियां पत्थर पर उकेरी गई हैं।

शानदार वास्तुकला: मंदिर ग्रेनाइट पत्थर से बना है और इसकी वास्तुकला द्रविड़, चालुक्य और कदंब शैलियों का अद्भुत मेल दिखाती है। गर्भगृह में शिवलिंग की पूजा होती है।

रोचक पौराणिक कथा

इस मंदिर की कहानी रावण और भगवान शिव से जुड़ी है। कथा के अनुसार, रावण ने शिव की कठोर तपस्या की थी। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें एक आत्मलिंग दिया, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि इसे कहीं भी जमीन पर मत रखना, नहीं तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा। लंका ले जाते समय रावण का अहंकार तोड़ने के लिए भगवान गणेश ने एक छल किया और आत्मलिंग यहीं ‘कंदुका गिरि’ पर स्थापित हो गया।

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दर्शन के नियम

सावन के महीने में यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है और दूर-दूर से भक्त आत्मलिंग के दर्शनों के लिए आते हैं। ध्यान रहे, मंदिर के गर्भगृह में दर्शन के लिए भारतीय परिधान (जैसे साड़ी, सलवार-कुर्ता, धोती आदि) पहनना जरूरी है। महिला और पुरुष दोनों को ही इस ड्रेस कोड का पालन करना होता है।

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