खामेनेई के बाद कौन संभालेगा ईरान, जानिए उस रहबर की ताकत

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Newschuski Digital Desk: ईरान में राष्ट्रपति और सांसद भले ही जनता के वोटों से चुने जाते हों, लेकिन वहां की अंतिम शक्ति एक ऐसे पद में निहित है जिसे ‘रहबर’ या ‘सुप्रीम लीडर’ कहा जाता है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद बना यह पद ईरान को एक ऐसी ‘धार्मिक तानाशाही’ में बदल देता है, जहां एक ही व्यक्ति के पास युद्ध, शांति और विदेश नीति के अंतिम फैसले लेने का हक होता है।

रहबर: खुदा का नुमाइंदा और सेना का असली बॉस

ईरान में रहबर सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि सर्वोच्च धार्मिक प्रतीक है।

असीमित अधिकार: देश की तीनों सेनाएं (थल, नभ, जल) और खूंखार ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) सीधे रहबर को रिपोर्ट करते हैं।

नियुक्तियों का किंगमेकर: न्यायपालिका का चीफ हो, सरकारी मीडिया का हेड या गार्जियन काउंसिल के सदस्य इन सबकी नियुक्ति रहबर ही करता है।

अयातुल्लाह vs रहबर: अक्सर लोग कंफ्यूज होते हैं, लेकिन अयातुल्लाह एक धार्मिक रैंक है जो कई लोगों के पास हो सकती है, जबकि रहबर पूरे देश का इकलौता राजनीतिक और रूहानी मालिक होता है।

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असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स: वो 88 धर्मगुरु जो चुनेंगे नया सुल्तान

खामेनेई के निधन के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स की है। यह 88 प्रभावशाली धर्मगुरुओं की एक गुप्त सभा है। इनका मुख्य काम ही रहबर का चुनाव करना है। वर्तमान युद्ध की स्थिति में इस सभा पर भारी दबाव है कि वे किसी ऐसे चेहरे को चुनें जो अमेरिका और इजरायल के सामने डटकर खड़ा रह सके।

राष्ट्रपति: चेहरा जनता का, गुलाम रहबर का

ईरान में राष्ट्रपति देश का दूसरा सबसे बड़ा पद है। वे सरकार चलाते हैं और बजट पेश करते हैं, लेकिन उनकी हैसियत एक मैनेजर जैसी होती है। वे अपनी मर्जी से न तो किसी देश से संधि कर सकते हैं और न ही युद्ध का ऐलान। हर बड़े फैसले के लिए उन्हें रहबर की ‘हरी झंडी’ की जरूरत होती है।

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गार्जियन काउंसिल: कानूनों का फिल्टर

यह 12 सदस्यों वाली एक ऐसी ताकतवर कौंसिल है, जिसके पास वीटो पावर होता है। अगर संसद कोई कानून बनाती है और इस कौंसिल को लगता है कि वह इस्लाम के खिलाफ है, तो ये उसे तुरंत रद्द कर सकते हैं। यहाँ तक कि कौन चुनाव लड़ सकता है और कौन नहीं, इसका फैसला भी यही कौंसिल करती है।

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संसद (मजलिस): जनता की आवाज, मगर पहरे में

ईरान की संसद में 290 सदस्य होते हैं जिन्हें जनता चुनती है। इनका काम कानून बनाना और मंत्रियों की नियुक्ति करना है, लेकिन इनकी हर फाइल ‘गार्जियन काउंसिल’ की निगरानी से होकर गुजरती है।

क्या है वेलायत-ए-फकीह

ईरान की इस अनोखी व्यवस्था की नींव अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी ने रखी थी। इस सिद्धांत का अर्थ है कि देश का शासन सबसे विद्वान और पवित्र इस्लामी न्यायविद (Faqih) के हाथ में होना चाहिए। इसी सोच ने ईरान को एक ऐसे ढांचे में ढाल दिया जहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन लगाम हमेशा सुप्रीम लीडर के हाथ में रहती है।

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