तारिक रहमान क्या कमाल पाशा बनेंगे?

बांग्लादेश में बीएनपी की जीत और तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य की बात पाकिस्तान की नीतिगत इस्लामिक हार और उसके एजेंडे का संहार होना है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि पाकिस्तान का एजेंडा क्या था, जिसका संहार हो गया। वास्तव में पाकिस्तान जमात की जीत चाहता था और बांग्लादेश को इस्लामिक देश के रूप मे तब्दील करना चाहता था, पाकिस्तान इस्लामिक आतंक का घर बनाना चाहता था। लेकिन बंगला देश की जनता ने जमात को खारिज कर उसकी हिंसा, उसकी घृणा, उसके जिहाद, उसकी पाकिस्तान परस्ती को संहार कर दिया, हाशिए पर ढकेल दिया है। फिर भी बांग्लादेश को इस्लामिक देश में तब्दील करने के खतरे टले नहीं हैं। जमात और उसके समर्थकों की हिंसा, घृणा, जेहाद और नफरत को कैसे नियंत्रण में किया जाएगा, कैसे कुचला जाएगा, यह महत्वपूर्ण विषय है।
जमात की हार कैसे हुई और बीएनपी की जीत कैसे हुई, तारिक रहमान को प्रधानमंत्री बनाने का अवसर क्यों मिला? खालिदा जिया की मौत हो चुकी थी और खालिदा जिया के पुत्र ब्रिटेन में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था, कोई एक दो साल से नहीं बल्कि सत्रह सालों से वह ब्रिटेन में रह रहा था। ब्रिटेन से ही वह शेख हसीना के खिलाफ बगावत कराने के लिए सक्रिय था। शेख हसीना के खिलाफ जो हिंसा हुई थी, छात्रों ने जो बगावत किया था उसके पीछे भी तारिक रहमान का समर्थन और नीति थी। ब्रिटेन और अमरीका का समर्थन तारिक रहमान को था। ब्रिटेन ने अमरीका के कहने के बाद ही शरण दिया था और बांग्लादेश में तख्ता पलट के लिए पैसे और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए था।
अमेरिका और दुनिया की अन्य शक्तियों ने भी तारिक रहमान की जीत पर दांव लगाया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि अमरीक ने बीएनपी के चुनावी खर्च भी उठाया था। आखिर क्यों? इसके पीछे कारण क्या है? इसके पीछे कारण चीन है। चीन का समर्थन जमात को था। भारत को तबाह करने के लिए जमात को चीन बांग्लादेश की सत्ता पर विराजमान करना चाहता था। अमरीका एक तरह से बंगलादेश को अपना गुलाम और उपनिवेश बनाना चाहता है, अमेरिका शेख हसीना का तख्तापलट में भी भूमिका निभाई थी, शेख हसीना खुद इस तरह का बयान दी थी। जमात भारत विरोधी है।

जमात ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम विरोध किया था और पाकिस्तान का साथ दिया था, पाकिस्तान सेना के लिए राहगार बना था, पाकिस्तान की सेना ने जमात के साथ मिलकर हज़ारों लोगों की हत्या की थी और हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। शेख हसीना की सरकार ने इस अपराध के लिए बहुत ही कड़ी नीति अपनाई थी और दर्जनों जमात नेताओं को फांसी पर चढ़वाई थी। शेख हसीना को भारत ने समर्थन दिया था, छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की जान पर आई खतरे का भारत ने निराकरण किया था और बांग्लादेश से शेख हसीना को सुरक्षित निकाल कर शरण दिया, इस कारण जमात भारत से दुश्मनी रखता है।
हिंदुओं की चुनावी रणनीति भी एक महत्वपूर्ण विश्लेषण का विषय है। हिंदुओं ने एक मुश्त समर्थन बीएनपी पार्टी को क्यों दिया? क्योंकि हिंदू बहुलता वाले क्षेत्रों में बीएनपी को एक मुश्त जीत मिली है, हिंदू बहुलता वाले क्षेत्रों में जमात को एक भी सीट नहीं मिली है। आखिर हिंदुओं ने एक मुश्त समर्थन बीएनपी पार्टी को क्यों दिया? जबकि बीएनपी और जमात दोनों पार्टियां हिंदू विरोधी ही नहीं बल्कि हिंदुओं का संहार करना चाहती हैं, हिंदुओं को मुसलमान बनाने के लिए हिंसा और कत्लेआम का समर्थन करती है।
शेख हसीना के तख्तापलट के बाद हिंदुओं पर कत्लेआम हुआ, हिंसा हुई, सौ से भी अधिक हिंदुओं की हत्या सरेआम हुई, सैकड़ों हिंदू महिलाओं को बलात्कार का शिकार बना दिया गया, हिंदुओं को मुसलमान बनने या फिर संहार होने के लिए तैयार रहने की धमकियां पिलाई गई थी। बीएनपी और जमात दोनों पार्टियां हिंदुओं को शेख हसीना का समर्थक मानती हैं। शेख हसीना की सरकार में हिंदुओं को सुरक्षा मिली हुई थी और हिंदुओं पर हिंसा करने वाले मुस्लिम जिहादियों पर कानूनी कार्रवाई भी त्वरित होती थी। इस कारण हिंदू भी शेख हसीना की सरकार में अपने आप को सुरक्षित पाते थे और हिंदू शेख हसीना को समर्थन करते थे।
बीएनपी और जमात दोनों पार्टियां हिंदू विरोधी है पर हिन्दुओं को विकल्प ही नहीं था। आखिर क्यों? क्योंकि तीसरा कोई विकल्प ही नहीं था, तीसरी कोई पार्टी ही नहीं थी। इसलिए हिंदुओं को इन्हीं दोनों में से किसी एक को चुनना था। जमात बहुत ही जहरीला और जिहादी है, उसने बांग्लादेश को इस्लामिक देश में तब्दील करने की घोषणा कर रखी थी, इतना ही नहीं बल्कि उसने महिलाओं को राजनीति और कामकाजी होने पर प्रतिबन्ध लगाने की भी घोषणा की थी, किसी महिला को चुनाव में उतारा भी नहीं था। जबकि बीएनपी और तारिक रहमान औसतन कम हिंसक और जिहादी है, बीएनपी सरेआम हिंदुओं के कत्लेआम की बात नहीं करती हैं, आधुनिक युग मे संवेदनशीलता और उदारता की अनिवार्यता को जानता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि बांग्लादेश में निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव लड़ना मुश्किल है, कई प्रकार की अनिवार्यता ऐसी है कि कोई भी निर्दलीय उम्मीदवार उस अनिवार्यता को पूरा ही नहीं कर सकता है। कई हिंदुओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के लिए कोशिश की थी पर उनकी उम्मीदवारी अमान्य कर दी गई थी। यही कारण था कि विकल्प के अभाव में हिंदुओं ने बीएनपी और तारिक रहमान को एक मुश्त समर्थन दिया और भारी जीत दिलाई।
अब हिंदुओं की सुरक्षा का क्या होगा? जमात और बांग्लादेश छात्र शिविर संगठन गुस्से में है, इन दोनों का आरोप है कि बीएनपी की जीत हिंदुओं की एकमुश्त वोट नीति से हुई है, हिंदुओं ने अगर वोट बीएनपी की जगह उन्हें दिया होता तो फिर बीएनपी की जीत नहीं होती। बीएनपी में एक बड़ा समूह हिंदू विरोधी है और हिंदुओं का कत्लेआम चाहता है। शेख हसीना को समर्थन देने वाली बात और नीति अब निरर्थक हो गई है। अब हिंदू बीएनपी के समर्थन में खड़े हैं, वोट देकर सत्ता दिलाई है। इसके अलावा बांग्लादेश के निर्माण में हिंदुओं का बलिदान भी अग्रणी है। इसलिए बीएनपी को अब हिंदुओं के प्रति नई नीति अपनानी होगी, पुरानी दुर्भावना को छोड़नी पड़ेगी। जमात और जिहादी लोगों से हिंदुओं को सुरक्षा दिलवानी होगी। बीएनपी हिंदुओं के प्रति अपनी पुरानी भूमिका और दुर्भावना छोड़ती है कि नहीं, यह देखना शेष है, भविष्य के गर्त में यह विषय छिपा हुआ है।
मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान परस्ती दिखाई थी। इस्लामिक परस्ती दिखाई थी, बांग्लादेश को जिहादी दौर में धकेलने की पूरी कोशिश की थी, भारत विरोधी घृणा प्रदर्शित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पाकिस्तान उसके लिए आइकन बन गया था। पाकिस्तान परस्ती से बांग्लादेश को कभी भी लाभ होने वाला नहीं है, पाकिस्तान सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद और जिहाद देगा, वह विकास और उन्नति का परिचायक नहीं बनेगा। पाकिस्तान खुद आटे और चावल के लिए तरस रहा है, कटोरा लेकर दुनिया से भीख मांग रहा है फिर भी पाकिस्तान को भीख नहीं मिल रही है, अपमान मिल रहा है।
सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान एक साजिश के तहत बांग्लादेश को भारत के खिलाफ मोहरा बनाना चाहता है। भारत से दुश्मनी रखने की उसकी रणनीति हमेशा जारी रहती है। अब तारिक रहमान को तय करना होगा कि वह पाकिस्तान का गुलाम और मोहरा बनाना चाहता है कि नहीं? भारत ने बांग्लादेश का निर्माण कराया, बांग्लादेश के विकास और उन्नति में भारत की भूमिका अनिवार्य तौर पर अग्रणी है, मुसीबत की घड़ी में भारत ने बांग्लादेश को मदद करने में कभी भी पीछे नहीं हटा है, इसलिए तारिक रहमान को भारत विरोधी पाकिस्तान की सक्रियता में शामिल नहीं होना चाहिए।
तारिक रहमान पर आंतरिक दबाव भी प्रभाव डालेगा। जमात और जिहादी तबका बांग्लादेश को इस्लामिक देश में तब्दील करने के लिए जिहाद का रास्ता अपनाएंगे, हिंसा और आतंक का पर्याय बन जाएंगे। इसके साथ ही साथ इस्लामिक दुनिया भी तारिक रहमान पर दबाव बनाएगी, आर्थिक मदद देने के बदले में इस्लामिक देश घोषित करने की शर्त रखेंगे। इस्लामिक आतंकी संगठन भी इस प्रश्न पर सक्रिय रहेंगे। घोर इस्लामिक करण का दंश पाकिस्तान, अफगानिस्तान, लीबिया, लेबनान, फिलिस्तीन, सीरिया जैसे अनेक इस्लामिक देश झेल रहे हैं। बांग्लादेश कोई धनी देश नहीं है, उसकी अर्थव्यवस्था कोई उन्नत भी नहीं है, भूख बेकारी और अर्थव्यवस्था संहार से तंग होकर बांग्लादेश के लोग भागकर भारत आते हैं। इस्लामिक देश घोषित करने से बांग्लादेश की समस्या और भी बढ़ेगी, बांग्लादेश भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तरह आतंक और जिहाद के कुचक्र में फंस जाएगा।
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तारिक रहमान सत्रह सालों तक ब्रिटेन में रहे हैं, इस दौरान उनकी मानसिकता जरूर प्रभावित हुई होगी, बदली होगी। ब्रिटेन की बहुलता वाद की संस्कृति उन्हें जरूर प्रभावित की होगी। कठमुल्लापन के खतरे से भी वे परिचित होंगे। इसलिए तारिक रहमान से यह उम्मीद है कि वे कमाल पाशा की नीति पर चलकर महान बन सकते हैं और बांग्लादेश को महान देश बना सकते हैं जहां पर सभी धर्मों को समान स्थान और विकास का अवसर मिले। तारिक रहमान के बांग्लादेश को भारत हर संभव मदद देने से पीछे नहीं हटेगा। इस बात को तारिक रहमान को समझना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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