लोकतांत्रिक गणराज्य से ही बचेगी मुस्लिम दुनिया

islamic world needs democratic
Acharya Shrihari
आचार्य श्रीहरि

ईरान के तानाशाह खामेनेई का इतना बुरा, भीषण, हिंसक अंत किसी ने सोचा तक नहीं था। इसके पहले इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन का भी हिंसक अंत हुआ था। लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी का अंत भी खतरनाक हुआ था। अफगानिस्तान, लेबनान, फिलिस्तीन सीरिया सहित अनेक मुस्लिम देशों में मुसलमानों के अंदर ही गाजर-मूली की तरह एक-दूसरे को काटने मारने की भीषण मानसिकता पसरी हुई है। रोहिंग्या मुसलमानों को किसी भी मुस्लिम देश शरण देने के लिए तैयार नहीं है। पाकिस्तानी मुसलमान मुस्लिम देश में भी लात और जूते खा रहे हैं। प्रतिबन्ध और अपमान झेल रहे है। आखिर ऐसा क्यों? क्या मुस्लिम दुनिया गैर लोकतांत्रिक होने की सजा भुगत रही है?

लोकतंत्र से मुस्लिम दुनिया को जन्मजात घृणा है, दुश्मनी है, गैर जरूरी शासन पद्धति है। यह काफिरों की शासन पद्धति है, जिससे इस्लामिक दुनिया को दूर रहना चाहिए। ऐसी समझ मुस्लिम दुनिया को गैर लोकतांत्रिक बनाती है, स्थापित करती है और दकियानूसी, कट्टरपंथी ही नहीं बनाती है बल्कि तानाशाही की ओर धकेल देती है। यही कारण है कि दुनिया में 60 से ज्यादा मुस्लिम देश है पर किसी भी में वास्तविक लोकतंत्र नाम का कोई अस्तित्व तक नहीं है। हर जगह इस्लामिक लोकतंत्र है, जिसमें जिहाद की प्रमुखता होती है। हिंसा की प्रमुखता होती है, विनाश और आत्मघात की प्रमुखता होती है।

इस्लाम के नाम पर गोलबंदी होती है, यूनियन बाजी होती है, गैर मुस्लिम दुनिया को डराने का जिहाद और आतंक का विजन जारी रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अल्पसंख्यक अधिकार गौण होता है। अल्पसंख्यक तो इस्लामिक लोकतंत्र में कीड़े मकोड़े की तरह होते हैं। जिन्हें नष्ट करना इस्लामिक लोकतंत्र अपना परम कर्तव्य मानता है, अपना अपनी शरीयत का फर्ज मानता है।

वास्तविक लोकतंत्र एक ऐसी छत्रछाया है, जिसके नीचे सभी को फलने और फूलने का अवसर देता है। उन्नति और विकास का आधारशिला होता है। मौलिक अधिकारों का संरक्षण होता है। इस तरह के लोकतंत्र में एक मुस्लिम बराक ओबामा अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाता है। मनमोहन सिंह भारत का प्रधानमंत्री बन जाता है। अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बन जाता है, भारत विभाजन की दोषी मुस्लिम आबादी अपनी आबादी 25 प्रतिशत से ऊपर करने में सफलता प्राप्त करती है। मूल आबादी हिंदुत्व को ही दफन करने के जिहाद पर आक्रामक रहती है।

ब्रिटेन में लोकतांत्रिक गणराज्य का लाभ उठा कर मुस्लिम आबादी अंग्रेजों यानी ईसाइयों को चुनौती देने के लिए शक्ति प्रदान कर लेती है। अपनी जनसंख्या बढ़ाकर लोकतांत्रिक गणराज्य पर आधिपत्य स्थापित करने की स्थिति में पहुंच जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोकतांत्रिक गणराज्य में विकास की सीढ़ियां आसानी से बनती है। ज्ञान विज्ञान की शक्तिशाली उपलब्धि प्राप्त होती है। सामरिक शक्ति भी प्रतिस्पर्धा में बलवान होती है। अमेरिका, इस्राइल, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान की सामरिक शक्ति, आर्थिक स्थिति और कूटनीतिक क्षमता के पीछे लोकतांत्रिक गणराज्य की ही खूबियां और महानता हैं।

दुनियां में इस्लाम सबसे बड़ा मजहब है, करीब 60 मुस्लिम देश है। पर क्या आप ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिश्र, कतर, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, नाइजीरिया, सूडान, इथियोपिया, यूएई, तुर्की, लेबनान, मारोक्को, लीबिया, इराक, अजरबेजान, सोमालिया, कुबैत आदि मुस्लिम देशों में बराक ओबामा, अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह सरीखा उदाहरण क्यों नहीं मिलता है? क्योंकि इस्लामिक दुनिया में लोकतांत्रिक गणराज्य हराम है और इस्लामी विरोधी विचार मान लिया गया है।

इनका कथित इस्लामिक लोकतांत्रिक गणराज्य एक प्रहसन है, मजाक है और अंतरराष्ट्रीय अनिवार्यता को पूरा करने की खानापूर्ति भर है। हर जगह तानाशाही पसरी हुई है। तानाशाही ऐसी की मानवता की रूहे कपकपा देती है। बर्बरता ऐसी की सभी हदें पार करती हैं। विकास और उन्नति को इस्लामिक मान्यताओं के खिलाफ मान लिया जाता है। आज की दुनियां में खुशनुमा जिन्दगी के लिए टेक्नोलॉजी की अनिवार्यता होती हैं। टेक्नोलॉजी उन्नयन में दखल नहीं रखने वाले, टेक्नोलॉजी दक्षता नहीं रखने वाले देश की कोई अपनी हैसियत नहीं होती है। कोई अपनी आर्थिक मजबूत व्यवस्था नहीं होती हैं। कोई अपनी सामरिक शक्ति नहीं होती हैं।

ऐसे देश सिर्फ और सिर्फ पंगु होते हैं। परआश्रित होते हैं, दया के पात्र होते हैं। मुस्लिम दुनिया के पास तेल और गैस का अपार भंडार है। आर्थिक शक्ति होने का प्रमाण और आधार है। पर तेल और गैस का उत्खनन मुस्लिम दुनिया स्वयं नहीं करती है। क्योंकि उनके पास उन्नत टेक्नोलोजी ही नहीं है। अमेरिका और यूरोप मुस्लिम दुनिया के तेल और गैस का उत्खनन करते हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि गैस तेल उत्थान का अधिकतम लाभ अमेरिका और यूरोप की कंपनियों के खातों में चला जाता है। मुस्लिम दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम लाभ प्राप्त कर अमेरिका और यूरोप मालों माल होते हैं।

मुस्लिम तानाशाहिया जनता के प्रति सहानुभूति समर्पण नहीं रखती हैं फिर मुस्लिम तानाशाहिया किसके प्रति सहानुभूति समर्पण रखती हैं? मुस्लिम तानाशाहिया सिर्फ अपने प्रति सहानुभूति समर्पण रखती है। जनता के प्रति सहानुभूति समर्पण रखने का सिर्फ खानापूर्ति करती हैं। नाटक करती हैं, एक्शन करती है। मुस्लिम दुनिया की मुस्लिम आबादी भी मुस्लिम तानाशाही के समर्थन में रहती हैं और साथ खड़ी रहती हैं, क्योंकि मुस्लिम आबादी को सिर्फ इस्लाम की कुरीतियां, रूढ़ियां चाहिए। शरीयत का शासन पद्धति चाहिए जिसे मुस्लिम तानाशाहिया देने के लिए तैयार रहती हैं। मुस्लिम तानाशाहिया भी जानती है कि इस्लाम की कुरीतियां रूढ़ियां और शरीयत देने मात्र से उनकी मुस्लिम आबादी खुश रहती है तो फिर विकास और सामरिक शक्ति बनाने की आवश्यकता ही क्या है?

मुस्लिम तानाशाहिया लुटेरी भी होती हैं और क्रूर भी होती हैं। अपने अपने देश की मुस्लिम तानाशाहियां खूब आर्थिक गबन करती है। अंधाधुंध धन जुटाती है और अपने समर्थकों को भी लुट खसोट का अवसर देती हैं। तानाशाह और शेख लूटी हुई सम्पत्ति का निवेश मुस्लिम देश में कदापि नहीं करती है, फिर निवेश कहा करती हैं? निवेश अमेरिका और यूरोप में करती हैं, शाहजादियां भी इन्हें अमेरिका और यूरोप की गोरिया चाहिए।

अमेरिका और यूरोप में निवेश इसलिए करती हैं कि ताकि उनकी संपतिया सुरक्षित रहें और मुनाफा भी देती रहें। इसके अलावा उनका रुतबा भी बढ़ता रहे। फिर अमेरिका और यूरोप में तानाशाही के परिजन भी खूब मनोरंजन करते हैं, एसोआराम करते हैं। इसके बदले में अमेरिका और यूरोप मुस्लिम तानाशाहों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक मदद करते हैं, विद्रोह के समय तुरंत सेना भेजते हैं। कहना यह है कि कि मुस्लिम तानाशाहों द्वारा लूटी गई संपत्ति से अमेरिका और यूरोप का बाजार गुलजार होता है, समृद्ध होता है, लाभकारी होता है और अमेरिका यूरोप के नागरिकों का जीवन सुखमय बनता है। स्विस बैंकों में सर्वाधिक पैसा मुस्लिम दुनिया के तानाशाहों और शेखों का जमा है।

मुस्लिम देशों की गोलबंदी और यूनियन बाजी निरर्थक बन गई है। मुस्लिम दुनिया ईरान के हस्र को बचा नहीं सकी। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी की भी मुस्लिम दुनिया बचा नहीं सकी थी। लेबनान और फिलिस्तीन की लहूलुहान परिस्थितियों मानवता को शर्मसार कर रही हैं। एक मुस्लिम देश दूसरे मुस्लिम देश से संघर्ष और लड़ाई युद्ध में फंसे हुए। ऐसा इसलिए हो रहा है की तानाशाही मुस्लिम तानाशाहियों में अवसर की पहचान और परिस्थितियों की पहचान या फिर मुस्लिम दुनिया में हितों का समन्वय लापता है।

अगर मुस्लिम देशों में लोकतंत्र होता तो लोकतांत्रिक शासन होता तो फिर अमेरिका और यूरोप से बेवजह प्रतिस्पर्धा करने, तकरार करने और युद्ध की परिस्थितियों उत्पन्न करने, इजरायल का समूल नाश करने पर आमदा और हिंसक नहीं होते, बीच का रास्ता निकालकर अमेरिका यूरोप के प्रकोप से बचने की कोशिश होती। आर्थिक और सामरिक ढांचे को मजबूत करने का स्वदेशी प्रयास होता। अब ईरान का एक महत्वपूर्ण प्रश्न देख लीजिए, ईरान की तानाशाही द्वारा इसराइल पर हमास से हमला करने की जरूरत नहीं थी और न हीं इजराइल का समूल नाश करने की नीतियां बनने की अनिवार्यता थी। अमेरिका से टकराने का नतीजा पूरी मुस्लिम दुनिया देख चुकी है।

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मुस्लिम दुनिया को मेरी सीख है कि उन्हें लोकतांत्रिक गणराज्य में ढालना चाहिए। मुस्लिम दुनिया को लोकतांत्रिक गणराज्य ही बचा सकता है। समृद्धि ला सकता है सामरिक तौर पर मजबूत बना सकता है। संप्रभुता को अक्षुण्ण रख सकता है। आर्थिक समृद्धि की तस्वीर आकर्षण बन सकता है। प्रेरणादाई बना सकता है और अमेरिका यूरोप की समृद्धि से प्रतिस्पर्धा कर सकता है। भारत इसका एक बड़ा और प्रेरणादाई उदाहरण है।

भारत में लोकतंत्र है, भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, भारत के पास विदेशी आक्रांताओं और अमेरिका चीन, पाकिस्तान सहित अन्य मुस्लिम देशों की आतंकी मानसिकता और कूटनीतिक दबाव की चुनौतियां खतरनाक और भीषण रही है, लेकिन भारत ने चीन और पाकिस्तान के साथ भी लंबे चलने वाले युद्ध से परहेज किया। युद्ध को लंबे समय के लिए आमंत्रण नहीं दिया। मुस्लिम दुनिया को भारत की इस नीति से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। अगर मुस्लिम दुनिया लोकतांत्रिक गणराज्य को स्वीकार करती हैं तो फिर मुस्लिम आबादी भी आतंकवाद और हिंसा जैसी बुराइयों से मुक्त हो सकती है क्योंकि लोकतांत्रिक गणराज्य बहूलता, उदारता, समन्वय तथा शांति में विश्वास रखता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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