आध्यात्मिक रंगों का महापर्व, ऋतुराज बसंत का संदेश और सामाजिक समरसता का अनूठा उत्सव

Holi 2026: सनातन संस्कृति में होली पर्व को ऋतुराज बसंत का संदेशवाहक माना जाता है। यह केवल आमोद-प्रमोद का पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्म का अनूठा उत्सव है, जो सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिकता का संगम है। इस दिन सभी लोग आपसी मतभेद भुलाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं।
श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास के मुख्य न्यासी एवं गुरुकुल व मंदिर सेवा योजना के जम्मू-कश्मीर प्रांत प्रमुख डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय महाराज के अनुसार, होली प्रत्येक वर्ष देशभर में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। यह पर्व भगवान कृष्ण और राधा रानी के शाश्वत प्रेम का प्रतीक है, तो वहीं हिरण्यकशिपु पर भगवान विष्णु की जीत का भी प्रतीक है।
होली का आध्यात्मिक महत्व
डॉ. उपाध्याय बताते हैं कि होली का आध्यात्मिक स्वरूप अत्यंत गहन है। आत्मा का परमात्मा से मिलन ही असली होली है। रंग केवल बाहर ही नहीं, हमारे आभामंडल में भी छिपे होते हैं। हमारा संपूर्ण चिंतन, गति और आभामंडल रंगों के सहयोग से ही संचालित होते हैं। आज वैज्ञानिक दृष्टि इतनी विकसित हो गई है कि अब पहचान त्वचा से नहीं, आभामंडल से होती है।
होली का अवसर आध्यात्मिक साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन विभिन्न रंगों के ध्यान और साधना के प्रयोगों से आभामंडल को सशक्त बनाया जाता है। बसंत का अर्थ ही है- नया जोश, नई आशा, नया उल्लास और नई प्रेरणा। इसकी प्रस्तुति का बहाना है होली जैसा विलक्षण पर्व।
रंग ध्यान की वैज्ञानिक पद्धति
होली पर रंगों की गहन साधना हमारी संवेदनाओं को पवित्र करती है। असल में होली बुराइयों के विरुद्ध एक प्रयत्न है। विशेष पद्धति से रंगों का ध्यान किया जाता है। रंगों का हमारे शरीर, मन एवं आवेगों से गहरा संबंध है-
नीले रंग की कमी से क्रोध अधिक आता है
श्वेत रंग की कमी से अशांति बढ़ती है
लाल रंग की कमी से आलस्य पनपता है
पीले रंग की कमी से ज्ञानतंतु निष्क्रिय होते हैं
ज्योति केंद्र पर श्वेत रंग, दर्शन केंद्र पर लाल रंग और ज्ञान केंद्र पर पीले रंग का ध्यान करने से क्रमशः शांति, सक्रियता और ज्ञानतंत्र की सक्रियता बढ़ती है।
पंचतत्व और रंग
पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- इन पांच भौतिक तत्वों के अपने रंग हैं-
पृथ्वीतत्व का रंग पीला
जलतत्व का रंग श्वेत
अग्नितत्व का रंग लाल
वायुतत्व का रंग हरा-नीला
आकाशतत्व का रंग नीला
होली पर इन तत्वों और उनसे जुड़े रंगों का ध्यान करने से न केवल शरीर, बल्कि संपूर्ण वातावरण शुद्ध और सशक्त बनता है।
होली की विकृतियों से बचाव
डॉ. उपाध्याय चिंता जताते हैं कि आज की आधुनिकता ने इस आनंद और अध्यात्म के पर्व को कहां लाकर खड़ा कर दिया है। कभी होली के चंग की हुंकार से जहां मन की रंजिश की गांठें खुलती थीं, वहीं आज होली के हुड़दंग, अश्लील हरकतों और खतरनाक केमिकल युक्त रंगों ने लोगों को भयाक्रांत कर दिया है।
आवश्यकता है कि हम होली के आध्यात्मिक स्वरूप को समझें और इस पर्व से जुड़ रही विसंगतियों को दूर करें। होलिका दहन का अर्थ है अपने अंदर की बुराइयों को जलाकर सदाचारी जीवन व्यतीत करना।
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स्वामी गुरु शिवाधर दुबे महाराज के पावन वचन-
“होली का अर्थ केवल रंगों का स्पर्श नहीं,
यह आत्मा का परमात्मा से मिलन का पर्व है।
आओ पहले अपने अंतर्मन की होलिका जलाएँ,
और फिर प्रेम, शांति व सद्भाव के रंग से जीवन सजाएँ।
जिस दिन मन का अभिमान जल जाएगा,
उस दिन सच्ची होली खिल उठेगी।
जब हृदय में करुणा का गुलाल उड़ेगा,
तभी जीवन में बसंत उतर पड़ेगा।”
(लेखक श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास एवं गुरुकुल व मंदिर सेवा योजना प्रमुख, जम्मू-कश्मीर प्रांत के मुख्य न्यासी हैं)
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