सावन की बूंदें

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अरबिन्द शर्मा अजनवी
अरबिन्द शर्मा अजनवी

बरसे सावन झूम-झूम के,
पुरुआ के संग कजरी गाये।
प्रेयसी के अंतर्मन में,
प्रेम मिलन की आस जगाये।।

ह्रदय तल के मौन भाव में,
प्रेम नीर बनकर बरसे।
पिया मिलन के व्याकुल मन में,
प्रेम सुधा रस बन छलके।।

आस लगाये राह निहारे,
चिलमन ओट से प्रियतम की।
रात -रात भर निंद न आये,
याद सताये साजन की।।

सावन की ठंडी बयार संग,
पड़े फुहार अब तन पे।
अंग-अंग अब ले अंगड़ाई,
तन-मन में बिजली चमके।।

ठमक-ठमक कर मोर नाचते,
उमड़-घुमड़ बादल घनघोर।
विरह गीत दादुर धुन लागे,
झन-झन-झन, झींगुर करे शोर।।

टप-टप, छप-छप करतीं बूंदे,
धरती की अब प्यास बुझाये।
हाय रे तू बेदर्दी बालम,
काहें, हमरी दर्द बढ़ाये।।

घनन-घनन घन गरजे बदरा,
घनघोर अंधेरा छाये।
पिऊ-पिऊ कर पपीहा बोले,
हिय में आग लगाये।।

तड़प रही मैं सेज अकेली,
अभिलाषा पूरी कर दो।
अब तो आन मिलो प्रियतम तुम,
मेरे मन की, प्यास बुझा दो।।

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