Poem: बुढ़ापे का सितम और वो हसीं यादें

poem budhape ka sitam old age memories
arvind sharma ajnabi
अरविंद शर्मा अजनबी

हुस्न की महफिल में कभी, हम भी ‘नवाब’ हुआ करते थे,
देख कर सूरत हमारी, लोग ला-जवाब कहा करते थे।
अब तो आईने से भी, अपनी कुछ अनबन सी रहती है,
वरना हम भी महकते हुए, ताज़ा गुलाब हुआ करते थे।

वो दिन भी क्या दिन थे, जब हम भी जवाँ कहलाते थे,
गली से गुज़रते थे हम तो, हज़ारों शोर मच जाते थे।
कभी खिड़कियां खुलती थी, और आँचल लहराता था,
बिना बुलाए ही कितनों के, पैगाम-ए-इश्क़ आता था।

वो हुस्न की परियाँ, वो रानियाँ, पीछे-पीछे चलती थीं,
हमारी इक मुस्कराहट पे, मोम की तरह पिघलती थीं।
मगर अफ़सोस! इस बुढ़ापे ने, सारा नक़्शा ही बिगाड़ दिया,
खिले हुए उस चमन को, पतझड़ ने उजाड़ दिया।

अब तो सूरत देख कर मेरी, हसीनाएं मुँह फेर लेती हैं,
जो कल तक ‘जान’ कहती थीं, वो अब ‘बाबा’ कह देती हैं।
कोई घास तक नहीं डालता, ये कैसा जुल्म छाया है,
मुझको तो लगता है मुआ, ये बुढ़ापा ही पराया है।

दिल तो आज भी कहता है कि, कोई नया इश्क़ फरमाऊँ,
किसी महबूबा की ज़ुल्फों में, ज़रा सा मैं भी खो जाऊँ।
मगर जब आईना देखूँ, तो खुद से खौफ आता है,
सफ़ेद बालों का जंगल, मुझे डराने लग जाता है।

बदन में दर्द है लेकिन, रूह अभी तक मस्तानी है,
दिक्कत बस इतनी है कि, शक्ल अब खानदानी है।
कोई साथ चलने को अब, ज़रा तैयार नहीं होता,
बिना दाँतों के चेहरे से, किसी को प्यार नहीं होता।

मगर ऐ दिल! तू हार मत, ये वक्त की बस एक चाल है,
अंदर से तू ‘जवान’ है, बाहर से बस बुरा हाल है।
हसीन यादों के सहारे ही, ये ज़िंदगी गुज़ार देंगे,
बूढ़े हुए तो क्या हुआ, ख्वाबों में अब भी बाज़ी मार देंगे!

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