ईरान-अमेरिका के बीच शांतिदूत बना पाकिस्तान, पर्दे के पीछे चली लंबी कूटनीति, जानें कैसे टला एक बड़ा युद्ध

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Newschuski Digital Desk: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर वो नहीं होता जो कैमरों के सामने दिखता है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध की आहट के बीच, एक ऐसी शांत कूटनीति (Silent Diplomacy) चली जिसने दुनिया को एक बड़े संकट से बचा लिया। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के साथ अस्थायी युद्धविराम कराने के लिए पाकिस्तान को एक संदेश संवाहक (Messenger) के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस्लामाबाद बना वॉशिंगटन और तेहरान का बैक-चैनल

व्हाइट हाउस ने ईरान से सीधे बात करने के बजाय पाकिस्तान के जरिए अपनी शर्तें और प्रस्ताव तेहरान तक पहुँचाए। इसके पीछे रणनीति यह थी कि एक मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश के जरिए भेजा गया संदेश ईरान के लिए अधिक विश्वसनीय और स्वीकार्य हो सकता है।

आसिम मुनीर और ट्रंप के बीच सीधी बात

इस बेहद गोपनीय मिशन की कमान खुद पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने संभाली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। पाकिस्तानी अधिकारियों ने वॉशिंगटन के 15-सूत्रीय प्लान को ईरान तक पहुँचाया, जिसके जवाब में ईरान ने भी अपने 5 और 10 बिंदुओं वाले प्रस्ताव भेजे। इसी खींचतान और बातचीत के बाद ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की कुछ शर्तों पर नरम पड़ने को तैयार हुआ।

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कठोर बयानबाजी के बीच दो हफ्तों का युद्धविराम

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ पर्दे के पीछे दोस्ती का हाथ बढ़ाया जा रहा था, वहीं सार्वजनिक मंचों पर ट्रंप की बयानबाजी काफी सख्त बनी रही। उन्होंने बार-बार ईरान को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। आखिरकार, इस ‘सीक्रेट गेम’ का नतीजा यह निकला कि अमेरिका, ईरान और इजरायल दो हफ्तों के युद्धविराम पर सहमत हो गए।

क्या पाकिस्तान की कूटनीति स्वतंत्र है

इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान की कूटनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप की डेडलाइन बढ़ाने के लिए जो सोशल मीडिया पोस्ट किया था, वह व्हाइट हाउस की मंजूरी के बाद ही जारी हुआ था। इससे साफ जाहिर होता है कि पर्दे के पीछे पाकिस्तान और अमेरिका के बीच तालमेल कितना गहरा था।

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