अखिलेश के PDA दिवस को मायावती ने बताया राजनीतिक नाटक, गेस्ट हाउस कांड की दिलाई याद
Lucknow News: आगामी 15 मार्च को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ गया है। समाजवादी पार्टी ने इस दिन को ‘पीडीए दिवस’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के रूप में मनाने का ऐलान किया है। लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे सपा की ‘वोट बैंक वाली नौटंकी’ करार दिया है।
मायावती ने एक तीखा बयान जारी कर कहा कि जो पार्टी दलितों और पिछड़ों के महापुरुषों का अपमान करती रही है, उसे कांशीराम जी की जयंती मनाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने सपा को कटघरे में खड़ा करते हुए कई सवाल दागे।
राजकीय शोक पर सवाल: मायावती ने पूछा कि जब कांशीराम जी का देहांत हुआ, तब सपा सरकार ने उनके सम्मान में एक दिन का राजकीय शोक तक घोषित क्यों नहीं किया था?
नाम बदलने का मुद्दा: बसपा ने याद दिलाया कि सपा सरकार के दौरान कांशीराम नगर (कासगंज) और संत रविदास नगर (भदोही) जैसे जिलों और कई संस्थानों के नाम बदल दिए गए थे।
जैसाकि सर्वविदित है कि समाजवादी पार्टी (सपा) का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से ही दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं बी.एस.पी.-विरोधी तथा ’बहुजन समाज’ में जन्में महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के आदर-सम्मान का नहीं बल्कि जग-ज़ाहिर तौर पर इनके अनादर, अपमान व तिरस्कार का ही रहा है, इस बारे…
— Mayawati (@Mayawati) February 26, 2026
गेस्ट हाउस कांड का जिक्र और पुरानी रंजिश
मायावती ने 2 जून, 1995 के स्टेट गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए कहा कि बहुजन समाज उस खौफनाक मंजर को कभी नहीं भूला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा का जातिवादी और सांप्रदायिक रवैया जगजाहिर है। मायावती ने बहुजन समाज से अपील की कि वे सपा की इस ‘प्रतीकात्मक राजनीति’ से सावधान रहें और उनके बहकावे में न आएं।
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सपा का रुख, सामाजिक न्याय की नई लड़ाई
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी का कहना है कि ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का संदेश किसी एक पार्टी की बपौती नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का एक मिशन है। सपा नेताओं के मुताबिक, कांशीराम जी के सामाजिक परिवर्तन के विचारों को घर-घर पहुँचाने के लिए 15 मार्च को उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। पार्टी का लक्ष्य दलित-पिछड़ा और अल्पसंख्यक एकता को मजबूत करना है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में दलित और पिछड़ा वोट बैंक सत्ता की चाबी है। कांशीराम जयंती के बहाने अखिलेश यादव जहाँ बसपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं मायावती अपनी जमीन बचाने के लिए सपा के ‘दलित विरोधी’ इतिहास को ढाल बना रही हैं।
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