सलमान खुर्शीद ने लिखा है काशी विश्वनाथ के विध्वंस का इतिहास

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Gyanvapi Masjid
Sanjay Tiwari
संजय तिवारी

सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) भारत के कानून मंत्री रह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के बड़े सम्मानित वकील भी हैं। बड़े मुसलमान नेता भी हैं और उससे भी बड़े कांग्रेस पार्टी के जिम्मेदार और वफादार राजनीतिज्ञ हैं। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अभी हाल ही में उनकी एक पुस्तक आयी है जिसको लेकर काफी चर्चा है। सनराइज ओवर अयोध्या (Sunrise Over Ayodhya) नाम से प्रकाशित उनकी पुस्तक काशी विश्वनाथ मंदिर के विध्वंस का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत कर रही है।

हालांकि उन्हें इस पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर काफी भला बुरा कहा गया, जिसके बारे में उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि अंग्रेजी का ठीक अनुवाद न समझ पाने के कारण लोगों को गलतफहमी हुई। लेकिन इस पुस्तक के सबसे महत्वपूर्ण अंश पर कोई चर्चा नहीं हुई। यह अंश है काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) का महिमापूर्ण इतिहास और इसके विध्वंस के तिथिवार प्रमाण। इस समय ज्ञानवापी (Gyanvapi Masjid) को लेकर जो भी चर्चा और कानूनी कार्रवाई चल रही है उसमें सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) की यह पुस्तक बहुत मायने रखती है।

सलमान खुर्शीद ने लिखा है कि काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) सनातन हिन्दू आस्था वाले लोगों के लिए बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे ज्यादा पवित्रतम है। काशी विश्वनाथ मंदिर को कई बार अलग अलग शासकों ने तोड़ा लेकिन हिन्दू समुदाय ने इसे हर बार पुनः अपनी आस्था और क्षमता से खड़ा किया। काशी विश्वनाथ का ज्ञात पहला विध्वंस 1124 में मुहम्मद गोरी ने किया। इस विध्वंस के बाद जब गोरी चला गया तो हिंदुओं ने इसको फिर से ठीक किया और अपने पवित्र स्थल पर पूजा आदि करने लगे। इस घटना के 70 वर्ष बाद 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने फिर इसको तोड़ कर बर्बाद कर दिया।

इसके बाद फिर से हिन्दू समुदाय ने इसको खड़ा किया। इसके 156 वर्ष के बाद 1351 में फिरोजशाह तुगलक ने फिर इस मंदिर को तोड़ दिया। बहुत संघर्ष के बाद फिर से हिन्दू समाज ने अपने इस पवित्र स्थल का पुनर्निमाण किया। यह स्थल पुनः अपने उत्कर्ष पर आया और 319 वर्ष तक सब कुछ सामान्य रहा लेकिन 1669 में औरंगजेब ने अपने सरकारी फरमान से काशी विश्वनाथ का विध्वंस कराया और वहां आलमगीर मस्जिद बना दी, जिसे आज ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। तोड़े गए मंदिर के अंश अभी भी मस्जिद के भीतर और उसकी दीवारों पर मौजूद हैं।

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यह किसी हिन्दू, साधु, कथाकार, वाचक या सामान्य व्यक्ति ने नहीं लिखा है। यह लेखन भारत के कानून मंत्री रह चुके देश के जिम्मेदार राजनीतिज्ञ और स्वयं मुसलमान के रूप में रहने वाले सलमान खुर्शीद ने लिखा है। अब इससे ज्यादा पुख्ता और ताजा सबूत क्या चाहिए। इसके अलावा भी काशी विश्वनाथ मंदिर के सम्बन्ध में कई पुस्तकें प्रमाण के तौर पर उपलब्ध हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ नाम की पुस्तक है। यह पुस्तक औरंगज़ेब के दरबारी लेखक सकी मुस्तईद ख़ान ने 1710 में लिख कर पूरी की थी। इसी पुस्तक में उस फरमान का उल्लेख है, जिसमें औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था।

इस फरमान के बारे में काशी विद्वतपरिषद के संगठन मंत्री गोविंद शर्मा ने काफी शोध भी किया है और लिखा भी है। वह लिखते हैं –

1936 के मुक़दमे की बात है। अदालत में दोनों पक्षों के द्वारा सबूत पेश किए जा रहे थे। ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ और औरंगज़ेब के फ़रमान की चर्चा हुई। मुसलमानों ने उर्दू में लिखी ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ पेश की, जिसमें विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने और औरंगज़ेब के ऐसे किसी फ़रमान का ज़िक्र नहीं था। हिन्दू पक्ष निराश हो गया। हिन्दू पक्षकारों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी, लेकिन कुछ ही दिनों के अन्दर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉ. परमात्मा शरण ने फ़ारसी में लिखी और 1871 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के द्वारा प्रकाशित असली ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दी। जिसकी पृष्ठ संख्या 88 पर औरंगज़ेब के आदेश पर काशीविश्वनाथ मन्दिर को तोड़े जाने का ज़िक्र है। तब जाकर उस साज़िश का पर्दाफ़ाश हुआ जो उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में रची गई थी। इसी यूनिवर्सिटी ने ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ का 1932 में उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया था। जिसमें से षडयंत्रपूर्वक श्रीकाशी विश्वनाथ के इतिहास वाले पन्नों को निकाल दिया गया था।

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क्रमशः

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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