पुष्कर में 2000 विद्वानों का महाजुटाव, आतंकवाद के सफाए और विश्व शांति के लिए 43 दिन का शत गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ शुरू
पुष्कर (राजस्थान): विश्वव्यापी आतंकवाद के दमन, हिंदूराष्ट्र निर्माण और विश्व शांति के पवित्र उद्देश्य से, राजस्थान के ब्रह्मतीर्थ पुष्कर में एक ऐतिहासिक और अलौकिक धार्मिक अनुष्ठान का आगाज़ हुआ है। परम पूज्य अनंतश्रीविभूषित स्वामी श्रीप्रखर जी महाराज के सानिध्य में, 2000 कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण 43 दिनों तक चलने वाले भव्य शत (100) गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ को संपन्न कर रहे हैं। 200 कुण्डीय यज्ञशाला में आयोजित यह याज्ञिक प्रयोग कलिकाल में एक विशिष्ट आध्यात्मिक घटना है।
यज्ञ की समयावधि और पूर्णाहुति
यह महायज्ञ 8 मार्च 2026 (रविवार, चैत्रकृष्णपक्ष पंचमी) से आरंभ होकर 19 अप्रैल 2026 (रविवार, वैशाख शुक्लपक्ष द्वितीया) तक चलेगा। इस दिन एक भव्य समारोह के साथ यज्ञ की पूर्णाहुति होगी।

सतयुग के बाद कलयुग में दोहराया जा रहा है इतिहास
जम्मू कश्मीर प्रांत के गुरुकुल एवं मंदिर सेवा योजना प्रमुख और श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट के मुख्य न्यासी, डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय ने यज्ञ की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए इसके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आदि चतुर्युगी के प्रथम सतयुग में, महर्षि विश्वामित्र ने उस समय की समस्याओं के समाधान हेतु गायत्रीशक्तिपीठ, मणिवेदिकापीठ पुष्कर में इसी यज्ञ को किया था।
आज, जब पूरा विश्व आतंकवाद, अशांति और विविध उपद्रवों से भयाक्रांत है, महाराजश्री द्वारा वैश्विक समकालिक समस्याओं के समाधान हेतु इसी महाप्रयोग को पुनर्जीवित किया जा रहा है। उन्होंने बांग्लादेश में सनातनी समुदाय पर हुए अत्याचारों का उदाहरण देते हुए कहा कि सनातन धर्म को आघात पहुँचाने के कुत्सित प्रयासों से समस्त सनातन धर्मी व्यथित और सशंकित हैं।
संकटमोचक के रूप में स्वामी श्रीप्रखर महाराज
महाराज की शिष्या माता चिदानंदमयी ने बताया कि विश्व कल्याण हेतु जब भी कोई विपदा आई है, महाराज ने यज्ञ और अनुष्ठानों के माध्यम से आध्यात्मिक ऊर्जा सृजित कर संकटों का समाधान किया है। उन्होंने वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19) का उदाहरण दिया, जब 2021 में काशी में 51 दिवसीय विराट श्रीलक्षचण्डी महायज्ञ आयोजित किया गया था, जिसके बाद वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने महामारी के दुष्प्रभाव के खत्म होने की घोषणा की थी।

यज्ञ की भव्यता और वैज्ञानिक आधार
महाराज ने अपने संकल्प पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि एक पुरश्चरण में 24 लाख गायत्री मंत्रों का जप होता है। अतः 100 पुरश्चरणों में कुल 24 करोड़ गायत्री मंत्रों का जप होगा। इसके दशांश हवन (कुल मंत्र प्रयोग – 27 करोड़) हेतु यज्ञशाला में 200 यज्ञकुण्ड बनाए गए हैं, जिसमें 200 भाग्यशाली ब्राह्मण यजमान भाग ले रहे हैं। उन्होंने पद्मपुराण और अन्य पुराणों के हवाले से बताया कि महर्षि विश्वामित्र द्वारा किए गए पूर्ववर्ती यज्ञ के फलस्वरूप सृष्टि में विशिष्ट परिवर्तन हुए थे।
आध्यात्मिक ऊर्जा से धर्मविरोधियों का हृदय परिवर्तन
डॉ. सज्जन त्रिपाठी ने विश्वास जताया कि इस यज्ञ से सृजित ब्राह्मी शक्ति (आध्यात्मिक ऊर्जा) धर्मविरुद्ध आचरण करने वालों का मन परिवर्तित कर देगी। वहीं, प्रो. कमलाकान्त त्रिपाठी (श्रीकाशीविद्वद्धर्मपरिषद के कार्यकारी अध्यक्ष) ने विप्रजनों से इस यज्ञ का अंग बनने का आह्वान किया। तंत्र आगम के विद्वान डॉ. रामप्रिय पाण्डेय ने कहा कि यद्यपि यह यज्ञ ब्राह्मणों द्वारा किया जा रहा है, लेकिन इसका फल संपूर्ण विश्व के प्राणी मात्र के कल्याण के लिए होगा। इस महायज्ञ में निम्नलिखित विद्वान मुख्य भूमिकाओं में हैं।
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मुख्य यजमान (यजमान प्रतिनिधि): स्वामी श्री गुरु शिवाधर दुबे महाराज (काशी) और डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा (वाराणसी)
मुख्य यज्ञाचार्य: डॉ. सुनील दीक्षित
दैनिक कार्यक्रम
प्रातः 6 से दोपहर 2 बजे: 2000 ब्राह्मणों द्वारा गायत्री मंत्र का जप
सायं 5 बजे से सूर्यास्त: हवन और भव्य महाआरती
पुस्तक विमोचन: कथावाचकों के अधिकार पर चर्चा
इस पावन अवसर पर, प्रो. कमलाकान्त त्रिपाठी द्वारा लिखित पुस्तक ‘प्रवचन अधिकार विमर्श’ का विमोचन किया गया। यह पुस्तक आज के कथावाचकों के विषय में निर्णायक है और सामान्य जनमानस के लिए ग्राह्य है।
पुष्कर के तीर्थपुरोहित, महाराज जी के परिकर और देश के विशिष्ट महानुभाव इस महायज्ञ में विशेष सहयोग कर रहे हैं। यह महायज्ञ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक रूप से दर्शनीय है और विश्व कल्याण की दिशा में एक बड़ा कदम है।
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