गैस संकट ने कानपुर के उद्योगों की कमर तोड़ी, 2 हजार मजदूर बेरोजगार, 40% छंटनी की तैयारी

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कानपुर: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और उससे पैदा हुए गैस संकट ने कानपुर के उद्योगों की कमर तोड़ दी है। कॉमर्शियल गैस सिलेंडरों की किल्लत से लोहा-स्टील कटिंग उद्योग लगभग ठप हो गया है, जबकि प्लास्टिक और साबुन-डिटर्जेंट उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी पर संकट गहरा गया है।

मेटल कटिंग उद्योग ठप, 2 हजार मजदूर बेरोजगार

दादानगर, फजलगंज, पनकी और चौबेपुर औद्योगिक क्षेत्रों में संचालित 500 से अधिक मेटल कटिंग इकाइयों का काम पूरी तरह ठप हो गया है। इन इकाइयों में लोहा, स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर की कटिंग कर मशीनों, ऑटोमोबाइल और कृषि उपकरणों के पुर्जे तैयार किए जाते हैं। इनका पूरा काम एलपीजी आधारित गैस कटिंग पर टिका है।

फीटा के महासचिव उमंग अग्रवाल ने बताया, बिना गैस कटिंग मशीनें चलना संभव नहीं है। कई फैक्ट्रियों में मशीनें बंद पड़ी हैं, मजदूर खाली बैठे हैं। यह पहली बार है जब गैस आपूर्ति रुकने से इतने बड़े पैमाने पर काम ठप हुआ है। करीब 2 हजार मजदूरों की रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ा है।

1500 करोड़ के सालाना कारोबार वाले इस उद्योग से जुड़े प्रदीप सिंह और अनुज अग्रवाल के मुताबिक, अगर जल्द गैस आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग सेक्टर का उत्पादन भी प्रभावित होगा।

प्लास्टिक उद्योग में 40% छंटनी की तैयारी

क्रूड ऑयल के महंगा होने और किल्लत ने प्लास्टिक उद्योग की कमर तोड़ दी है। कच्चे माल (प्लास्टिक दाने) की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी से उत्पादन लागत बढ़ गई है, जिससे कई फैक्ट्रियों में उत्पादन 70% तक घट गया है।

कानपुर प्लास्टिक एसोसिएशन के अध्यक्ष इखलाक मिर्जा ने कहा, लागत बढ़ने और ऑर्डर घटने से कंपनियां भारी घाटे में हैं। 40% तक छंटनी की तैयारी है। अगर एक-दो दिन में हालात नहीं सुधरे तो रोजगार छिनने का खतरा बढ़ जाएगा। इस उद्योग से जुड़ा 650 करोड़ का निर्यात कारोबार भी प्रभावित हुआ है।

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साबुन-डिटर्जेंट की 250 फैक्ट्रियां बंद, 5 हजार मजदूर घर बैठे

क्रूड ऑयल संकट ने कानपुर के पारंपरिक साबुन-डिटर्जेंट उद्योग की रफ्तार थाम दी है। कभी दिन-रात चलने वाली डिटर्जेंट पाउडर बनाने वाली फैक्ट्रियों में अब सन्नाटा पसरा है। कच्चे माल (केमिकल लैब्सा) की सप्लाई बाधित होने से करीब 250 फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप हो गया है।

कारोबारी मिकी मनचंदा ने बताया, दो माह में लैब्सा की कीमत 120 से बढ़कर 260 रुपये प्रति किलो हो गई है। कई सप्लायर ने माल भेजना बंद कर दिया है। उत्पादन लागत इतनी बढ़ गई कि फैक्ट्री चलाना घाटे का सौदा बन गया है। इससे करीब 5 हजार करोड़ के कारोबार पर असर पड़ा है और करीब 5 हजार मजदूर घर बैठने को मजबूर हैं।

कारोबारियों ने सरकार से हस्तक्षेप कर कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित कराने और उद्योग को राहत देने की मांग की है। मजदूरों का कहना है कि रोज कमाने-खाने वालों के लिए अब चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो रहा है।

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