अयोध्या भाजपा जिलाध्यक्ष नहीं, कुर्सी कुश्ती का महामुक़ाबला

कलम के कांटे से: अयोध्या में भाजपा का जिला संगठन इस समय राजनीतिक अखाड़ा बना हुआ है। फर्क बस इतना है कि यहाँ दंगल में पहलवान नहीं, महत्वाकांक्षाएँ उतर रही हैं और रेफरी की सीटी लखनऊ से बजनी है। एक साल बीत गया, लेकिन जिलाध्यक्ष का नाम ऐसा ग़ायब है, जैसे रामलीला में रावण की भूमिका। सबको पता है कोई न कोई बनेगा, पर कब और कौन, ये रहस्य ही बना हुआ है।
भाजपा के तीन गुट ऐसे आमने-सामने हैं मानो तीन तेंदुए एक ही शिकार पर टूट पड़े हों। न शिकार मिला, न तेंदुओं की भूख मिटी। संगठन बैठा है, कार्यकर्ता खड़े हैं और कुर्सी अब भी अनाउंसमेंट के इंतज़ार में है।
कैडर बाहर, आयातित अंदर
भाजपा कभी कैडर पार्टी कही जाती थी, अब हालत यह है कि कैडर वाले घर बैठकर सम्मान बचाओ आंदोलन चला रहे हैं। संगठन में तरजीह उन्हें मिल रही है, जिनका भाजपा से रिश्ता ऐसा है जैसे ससुराल से ज़्यादा मायका प्यारा।
जो कल तक सपा-बसपा के पोस्टर चिपकाते थे आज वही संघ की शाखा में सबसे आगे दिखाई देते हैं। विचारधारा का यह परिवर्तन इतना तेज़ है कि न्यूटन का नियम भी शरमा जाए।
संघ विरोध से संघ वंदना तक
वेद प्रकाश गुप्ता और रामचंद्र यादव कल तक संघ, विहिप और भाजपा के विरोध में जिनके बयान मिल जाते थे, आज वही भगवा अंगवस्त्र ओढ़कर संगठन के खेवनहार बने बैठे हैं। राजनीतिक जानकार इसे कहते हैं बिना पानी की नदी में नाव चलाने की कोशिश और जनता इसे कहती है दिन में तारे देखना।
लल्लू सिंह : राजनीति के शतरंज मास्टर
पूर्व सांसद लल्लू सिंह भाजपा के उस खिलाड़ी की तरह हैं जो मोहरा भी खुद रखते हैं और चाल भी आख़िरी पल में चलते हैं। कौन दिल में है, कौन दिमाग में यह रहस्य वही जानते हैं और शायद ऊपर वाला। आज जो आँखों का तारा है, कल वही आँखों की किरकिरी बन सकता है भाजपा में इसे रणनीतिक संस्कार कहते हैं।
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ब्राह्मण, क्षत्रिय, पिछड़ा, अनुसूचित जाति सभी वर्ग लाइन में हैं। कुर्सी ऐसी हो गई है जैसे सरकारी नौकरी। फॉर्म सबने भर दिया, लेकिन मेरिट लिस्ट लखनऊ से आएगी। और सबसे बड़ा ट्विस्ट? इस घमासान में भी चर्चा यह कि संजीव सिंह तीसरी बार जिला अध्यक्ष बन सकते हैं यानि गुट लड़ते रहेंगे और ताज पुराने सिर पर ही रहेगा। अयोध्या भाजपा का जिला संगठन इस समय ना पूरी तरह संघ का, ना पूरी तरह पार्टी का, बल्कि गुटों की साझा मिल्कियत बन चुका है। नए जिला अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपनी ही पार्टी होगी। और अंत में इतना तय है, भाजपा में यहाँ कुछ भी तय नहीं, सिवाय इसके कि अंतिम फैसला वही होगा, जिसकी सबसे कम चर्चा होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।)
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