‘शतक’- RSS के 100 साल के सफर की शानदार दास्तां, इतिहास और तकनीक का एक बेजोड़ संगम
रेटिंग: 4.5/5
अवधि: 112 मिनट
Newschuski Digital Desk: अगर आप यह सोच रहे हैं कि ‘शतक’ संघ के बारे में होने वाली आम बहसों जैसी कोई फिल्म है, तो आप गलत हैं। निर्देशक आशीष मल्ल और उनकी टीम ने पर्दे पर जो जादू रचा है, वह दर्शकों को बहस से परे ले जाकर एक गहरे अनुभव और समझ से जोड़ता है। यह फिल्म संघ के पहले 50 सालों के संघर्ष और अगले 50 सालों के संकल्प की एक बेहद प्रभावशाली यात्रा है।
तकनीक और हकीकत का मेल
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका फिल्मांकन है। यह भारतीय सिनेमा की उन चुनिंदा फिल्मों में से है जहाँ ‘लाइव-एक्शन’ और ‘अत्याधुनिक तकनीक’ का ऐसा तालमेल दिखता है कि इतिहास की हस्तियां और पुराने दौर के दृश्य बिल्कुल जीवंत हो उठते हैं। सादगी भरे खुले मैदान, छोटी-छोटी सभाएं और शुरुआती दौर का माहौल आपको 1925 के कालखंड में ले जाता है।
डॉ. हेडगेवार और गुरुजी, नेतृत्व की दो अलग झलकियां
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार: फिल्म में संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार का चित्रण दिल को छू लेने वाला है। उन्हें ‘भारत का भुला दिया गया नायक’ दिखाया गया है, जिनकी सादगी और अनुशासन ने एक विशाल वटवृक्ष की नींव रखी। उनके बलिदान और शांत संकल्प को देखकर दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।
गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर): जैसे ही फिल्म गुरुजी के दौर में पहुँचती है, कहानी में एक ठहराव और गंभीरता आती है। गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंधों और उस कठिन समय में संगठन के पुनर्निर्माण को बड़ी ही सूझबूझ और बिना किसी अनावश्यक नाटक के पेश किया गया है।
राष्ट्र निर्माण के अनछुए पहलू
‘शतक’ सिर्फ एक संगठन की कहानी नहीं, बल्कि भारत के इतिहास के उन पन्नों को भी पलटती है जिनके बारे में ज्यादा चर्चा नहीं हुई। दादर और नागर हवेली की मुक्ति और कश्मीर को सुरक्षित करने में संघ के स्वयंसेवकों की पर्दे के पीछे की भूमिका को बड़ी ही सटीकता और गरिमा के साथ दिखाया गया है। ये दृश्य बताते हैं कि कैसे बिना किसी दिखावे के सेवा की भावना राष्ट्र के भविष्य को आकार दे रही थी।
मानवीय संवेदनाओं का केंद्र
इस फिल्म की आत्मा उन स्वयंसेवकों में बसती है जो अपना घर छोड़कर राष्ट्र सेवा में निकल पड़े। फिल्म उन युवाओं के भाव, उनके परिवारों की अनिश्चितता और उनके मौन समर्पण को बखूबी पकड़ती है। हर दृश्य में एक ठहराव है, जो दर्शकों को उस ‘समर्पण के भार’ को महसूस करने का मौका देता है।
इसे भी पढ़ें: फिल्मों के ऑफर्स ठुकराने पर अमृता फडणवीस ने तोड़ी चुप्पी
टीम की मेहनत और ईमानदारी
अनिल डी. अग्रवाल की परिकल्पना और वीर कपूर के निर्माण में बनी इस फिल्म के हर फ्रेम में इतिहास के प्रति सम्मान झलकता है। लेखकों (नितिन सावंत, रोहित गहलोत, उत्सव दान) ने कहानी को सनसनीखेज बनाने के बजाय ‘प्रामाणिकता’ पर जोर दिया है, जो काबिल-ए-तारीफ है।
‘शतक’ सिर्फ संघ से जुड़े लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो भारत के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों को समझना चाहता है। यह फिल्म दिखाती है कि हर बड़े विचार के पीछे वे साधारण लोग होते हैं जो असाधारण त्याग करते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद आप एक गहरी समझ और श्रद्धा के साथ सिनेमाघर से बाहर निकलेंगे।
इसे भी पढ़ें: मैथिली ठाकुर की हुंकार, धृतराष्ट्र और दुर्योधन से की लालू परिवार की तुलना
