कैकेयी के पूर्व जन्म की कथा: जानें कलहा से रानी कैकेयी तक का सफर
Pauranik Katha: पौराणिक मान्यताओं, विशेषकर आनंद रामायण (सारकांड, सर्ग 5) के अनुसार, रानी कैकेयी अपने पूर्व जन्म में ‘कलहा’ नाम की एक स्त्री थीं। उनकी कहानी पाप, पश्चाताप और ब्राह्मण के पुण्य से उद्धार की एक अद्भुत यात्रा है।
पूर्व जन्म में कलहा सौराष्ट्र के भिक्षु नामक ब्राह्मण की पत्नी थी। उसका स्वभाव अपने नाम के अनुरूप ही झगड़ालू था और वह सदैव अपने पति की इच्छा के विरुद्ध कार्य करती थी। इसी कलह से तंग आकर जब उसके पति ने दूसरा विवाह कर लिया, तो कलहा ने विष खाकर आत्महत्या कर ली।
आत्महत्या और बुरे कर्मों के कारण उसे कराल मुख नामक भयानक राक्षसी का जन्म मिला और वह वर्षों तक भटकती रही। एक बार सह्याद्रि पर्वत के पास उनकी भेंट धर्मदत्त नामक विद्वान ब्राह्मण से हुई। जब राक्षसी ने उन्हें डराना चाहा, तो धर्मदत्त ने उन पर तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) युक्त पवित्र जल छिड़का। तुलसी के प्रभाव से वह राक्षसी शांत हो गई और उसे अपने पूर्व जन्म का बोध हुआ।
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राक्षसी के प्रार्थना करने पर दयालु ब्राह्मण धर्मदत्त ने अपने जीवन भर के कार्तिक मास के व्रत का आधा पुण्य उसे दान कर दिया और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करने को कहा। इस पुण्य के प्रताप से वह राक्षसी पाप मुक्त होकर स्वर्ग गई और अगले जन्म में राजा अश्वपति की पुत्री तथा राजा दशरथ की पत्नी कैकेयी के रूप में जन्मी। वहीं, परोपकारी ब्राह्मण धर्मदत्त ने अगले जन्म में राजा दशरथ के रूप में अवतार लिया।
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