संवाद, साहचर्य और मधुर व्यवहार से बनी एक शख्सियत हैं बृजमोहन

personality profile brijmohan agarwal
sanjay dwivedi
प्रो. संजय द्विवेदी

आप रायपुर में हैं, वक्त कम है- निकलना है, पर लगता है किसी एक आदमी से तो मिल लें। पहला नाम याद आएगा, वो है बृजमोहन अग्रवाल का। मैंने जब से राजनीति और अपने समय को देखना शुरू किया वे रायपुर का सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं। आज भी जब वे राज्य की राजनीति से दिल्ली ‘रवाना’ कर दिए गए हैं तो भी ‘रायपुर’ उनके दिल में बसता है। रायपुर और बृजमोहन लंबे समय से पर्याय हो गए हैं। रामसागरपारा मोहल्ले से लेकर छात्र राजनीति और बाद में राज्य की राजनीति में चमके बृजमोहन की कथा बहुत रोचक है। अजेय राजनेता और अप्रतिम जनसंपर्क उनकी पहचान है।

मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक उनके चाहने वालों की रेंज बहुत लंबी है। जिसमें कलाकार हैं, पत्रकार हैं, साहित्यकार हैं, रंगकर्मी हैं और कौन नहीं हैं। आम लोगों के तो वो ‘मोहन भैया’ हैं ही। छत्तीसगढ़ जहां शुक्ल बंधुओं और कांग्रेस की बहुत गहरी जड़ें रही हैं। जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रहा है, वहां ऐसी स्थाई लोकप्रियता प्राप्त करना साधारण नहीं था।

चुनावी युद्धों के नायक

बृजमोहन अग्रवाल चुनाव लड़ रहे हों या चुनाव लड़ा रहे हों, तो वे भाजपा का शुभंकर हैं। उनके मैदान में उतरने मात्र से आधा मैदान मतदान के पहले ही जीत लिया जाता है। वे हैं ही ऐसे। कार्यकर्ताओं के नेता। लोगों के दिलों में उतरे। भरोसे के आदमी। इसलिए राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ में हुए उपचुनावों में प्रायः उनको ही चुनाव संचालक बनाया जाता रहा। वे जीत की गारंटी हैं। उनके लिए हर चुनाव जीतने के लिए होता है। वे दिन-रात परिश्रम कर सकने और अखंड प्रवास करने वाले राजनेता हैं। संयुक्त मध्यप्रदेश में भोपाल में उनका जो जलवा था, उसके रंग आज भी दिखते हैं। आज भी वे भोपाल में हैं तो लोगों से घिरे हैं।

छत्तीसगढ़ की स्थापना के 25 साल के बाद भी उनकी पुरानी राजधानी उन्हें भूली नहीं है। बृजमोहन भूलने देते भी नहीं। आप उन्हें याद न करें। दिवाली पर, होली पर, आपके जन्मदिन पर अचानक उनकी फोन काल, वाट्सअप मैसेज आपको उनसे जोड़ देगा। क्या आदमी है। राजनेता मतलब के रिश्ते हैं। बृजमोहन बेमतलब भी बहुत से रिश्ते रखते हैं। उन्हें क्या जरूरी है वे चुनाव रायपुर से लड़ते हैं लेकिन मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के लोगों से सीधे और जीवंत रिश्ते रखें। जीवन का बहुत सा हिस्सा मध्यक्षेत्र की राजनीति कर अब वे दिल्ली पहुंचे हैं। लेकिन वे दिल्ली में हैं लेकिन दिल्ली में नहीं हैं। सत्ता में लगातार होने ने भी उनको सामान्य बनाए रखा है। उनका समूचा व्यक्तित्व रिश्तों को जीने वाले आदमी की कहानी है।

personality profile brijmohan agarwal

कुर्सी उन पर नहीं, वे कुर्सी पर बैठे

सामान्य सी राजनीतिक सफलताएं पाकर इतराए और दृश्य से गायब हो गए लोगों की अनेक कथाएं हम जानते हैं। किंतु सातत्य, परंपरा और लोकसंस्कार के बृजमोहन प्रमाण हैं। विरोधी भी उन्हें नजरंदाज नहीं कर पाते। अपने विचारों पर अडिग रहते हुए भी विरोधियों को शत्रु न समझना उन्हें बड़ा बनाता है। वे लगातार कुर्सियों पर बैठे पर कभी कुर्सी उनपर नहीं बैठी। एक मन से लोगों से मिलना ही आत्मीय भाव का सृजन करता है। लगता है कि हम हमारे भाई से मिल रहे हैं, अपने दोस्त से मिल रहे हैं। यार से मिल रहे हैं। उनकी व्यस्तता अपार है। लोग काम करके थक जाते हैं किंतु लगातार लोगों से मिलना उन्हें जीवंत बनाता है।

जनता का प्यार ही उनकी शक्ति है। जो उन्हें बिना रुके, बिना थके काम करने के लिए प्रेरित करती है। आदरणीय भाभी साहिबा का उन्होंने जिस तरह साथ दिया, उनका ख्याल रखा। पूरे परिवार को साथ लेकर चले उस पर पूरी किताब अलग से लिखी जा सकती है। लेकिन उन- सा होना कठिन है। वे काम आते हैं, फिर भूल जाते हैं। पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया, इसमें दो राय नहीं किंतु उन्होंने भी अपनी क्षमता से ज्यादा परिश्रम किया। कठिन स्थितियों में भी दल में बने रहे। अपने विचार के लिए जीने वाले ऐसे राजनेता कितने हैं।

संवाद के सहारे बनाई दुनिया

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मेरी कर्मभूमि, पत्रकारिता की दीक्षा भूमि दोनों हैं। मैं 1994 से उन्हें जानता हूं। रामसागरपारा वाले उनके पैतृक मकान के सामने उनका एक कार्यालय हुआ करता था। वहां पहली बार मैंने उन्हें देखा। मित्र और तब स्पूतनिक अखबार के लिए काम करने वाले श्री मनोज शुक्ला ने मेरा परिचय उनसे करवाया। हमारा गोत्र तो एक ही था मैं भी छात्र जीवन में अखिलभारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा और वे भी एबीवीपी के रास्ते राजनीति में आए थे। मैंने उनका बहुत नाम सुन रखा था। उनके व्यवहार और आत्मीय स्वभाव की चर्चा चारों ओर थी। मैं मानता हूं कि संवाद, साहचर्य और मधुर व्यवहार ने उन्हें बहुत विराट बना दिया।

बृजमोहन यानि लोकव्यहार। लोगों से मिलना-जुलना उनके काम आना। यही बृजमोहन अग्रवाल की सरल व्याख्या है। राजनीति में पद, पैसा और प्रभाव अनेक के पास है, किंतु स्वभाव बृजमोहन के पास है। इसलिए कठिन स्थितियों में भी खड़े रहे। चलते रहे। उपेक्षाएं उन्हें तोड़ नहीं पायीं क्योंकि जनता का प्यार उनके साथ संयुक्त था। इस मायने में बृजमोहन होना साधारण नहीं है। मिलना, मिलते रहना। सुबह चार बजे तक मिलते रहना। ऐसा मैंने देखा है। मुझे लगता था यह आदमी ऐसा क्यों कर रहा। मैंने अनेक बार उनसे कहा भैया दिनचर्या का तो ख्याल रखिए। वे हंसकर टाल जाते थे। बीमारियों की उपेक्षा करते हुए। लगातार चाय पीते हुए। पान खाते हुए। वे मिलते रहते। एक बार तो वे सेविंग करवा रहे थे, उसी समय बुला लिया। मुझे अजीब सा लगा। क्या करते हैं आप। कुछ तो चैन लीजिए अभी लंबा काम करना है। यह बात शायद 1996 की है। उनकी बहुत सी यादें हैं।

कहां हो संजय, मैं आ रहा हूं

मैं उन दिनों बिलासपुर के दैनिक भास्कर में कार्यरत था। बृजमोहन जी पार्टी से बाहर थे। निष्कासित 6 सालों के लिए। बृजमोहन न सिर्फ अजीत जोगी सरकार के खिलाफ बोलते रहे, बल्कि पार्टी का काम करते रहे। वे जब भी बिलासपुर आते सूचना आ जाती कि भैया आ रहे हैं। वे कार्यालय आते या मिलने के लिए बुलाते। फोन उनकी आवाज भी गूंजती है- “कहां हो संजय बिलासपुर आ रहा हूं। रतनपुर चलेंगें क्या?” उनकी आत्मीयता विरल है। उनके कारण ही मेरा संबंध मूलचंद्र अग्रवाल से बना जो बिलासपुर से विधायक और मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। वे प्रायः मूलचंद जी के साईं मंगलम् में आते और हमारी भेंट होती। आज मूलचंद जी इस दुनिया में नहीं हैं, उनकी यादें बराबर आती हैं।

बिलासपुर में भी उनकी बड़ी दुनिया थी। बृजमोहन यारों के यार हैं। दोस्ती कर ली तो निभाएंगें। वे रिश्तों से बड़ा किसी चीज को नहीं मानते। लोगों की दुआएं ही हैं कि आज की प्रतिपल बदलती राजनीति में वे अप्रासंगिक नहीं हुए हैं। देश की राजनीति में जातिगत राजनीति की जो विषवेल पिछले वर्षों में पनपी, जहां जाति के आधार पर राजनीतिक निर्णय हो रहे हैं, बृजमोहन का टिका होना जनविश्वास की जीत ही है। वे बड़ी सफलताओं के, बड़ी कुर्सियों के हकदार थे किंतु राज्य के सामाजिक समीकरणों में उन्हें फिट नहीं पाया जाता। अपने लंबे संसदीय अनुभव के आधार पर वे समाज के लिए कितने उपयोगी हैं, कहने की जरूरत नहीं हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा बहुत प्रेरक है। छात्र नेता से दो राज्यों में मंत्री और सांसद बनना साधारण नहीं है। निरंतर जीत ने उनके आत्मविश्वास को पुष्ट किया है,जनता के निरंतर प्यार से वे ताकतवर बने हैं।

इसे भी पढ़ें: हिंदी पत्रकारिता के द्विशताब्दी वर्ष पर भारत भवन में तीन दिवसीय मीडिया महाकुंभ 8 मई से

हमारे बीच उनका होना यह आश्वासन है कि राजनीति में अभी मनुष्य शेष हैं। अभी भी परदुखकातरता और संवेदनशीलता राजनीति का आवश्यक गुण है। संवाद से सफलता मिलती है, परंपरा बनती है, दरवाजे बंद करके नहीं। बृजमोहन जी को वह सब कुछ मिला, जिसकी राजनेता अपेक्षा करते हैं। किंतु उनके पास मित्रों का जो संसार, सामान्य जन की दुआएं, जनता का प्रेम मिला वह दुर्लभ है। उनका होना यह भी आश्वस्ति देता है कि कलाकारों, पत्रकारों और साहित्यकारों से संवाद के लिए आपका इन कलाओं का जानकार होना जरूरी नहीं है, गुणग्राहक होना आवश्यक है। बृजमोहन गुणग्राहक हैं, इसमें दो राय नहीं। मेरे जैसे न जाने कितने लोग उन्हें सफल, स्वस्थ और ताकतवर देखना चाहते हैं क्योंकि राजनीति के ऐसे ‘धुरंधर’ रोज पैदा नहीं होते। उनके निर्माण के लिए एक विचार, एक संगठन और ध्येय पथ पर लगाए रहने वाले तपस्वी साधकों की जरूरत होती है। यह सुखद है जिस विचार को उन्होंने अपने छात्र जीवन में अपनाया उसी के लिए पूरी जिंदगी लगा दी। यह ध्येय पथ ही उनका मार्ग था, है और रहेगा। उनके सुखद जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक हैं। संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

इसे भी पढ़ें: बंगाल में फिर धोखा देंगे एग्जिट पोल, 2021 के डेटा ने ताजा किए पुराने घाव

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया NEWS CHUSKI के Facebook पेज को LikeTwitterInstagram पर Follow करना न भूलें...