कर्नल श्रीकांत पुरोहित बने ब्रिगेडियर, 17 साल लंबी कानूनी लड़ाई के सेना ने दिया सम्मान

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नई दिल्ली: भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय लेते हुए कर्नल श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत कर दिया है। यह फैसला न केवल वर्षों से लंबित न्याय को नई दिशा देता है, बल्कि एक ईमानदार अधिकारी की प्रतिष्ठा को पूरी तरह बहाल करता है।

यह वही अधिकारी हैं जो 17 साल तक कानूनी लड़ाई में उलझे रहे, जिन पर गंभीर आरोप लगे, जिन्होंने जेल देखी, लेकिन अंततः अदालत से पूरी तरह निर्दोष साबित हुए।

AFT ने रोकी थी सेवानिवृत्ति

हाल ही में सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) ने उनकी सेवानिवृत्ति पर रोक लगा दी थी। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मार्च 2026 को होनी थी, लेकिन AFT ने स्पष्ट कहा कि जब तक उनकी पदोन्नति से जुड़ी शिकायत पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक उन्हें सेवा से अलग नहीं किया जा सकता। अब सेना ने न केवल इस निर्देश का सम्मान किया, बल्कि उससे भी आगे जाकर पुरोहित को ब्रिगेडियर बना दिया।

दो साल और बढ़ गई सेवा

इस पदोन्नति के साथ ही उनकी सेवा अवधि अपने आप बढ़कर 31 मार्च 2028 तक हो गई है। दरअसल, ब्रिगेडियर का सेवानिवृत्ति आयु 56 वर्ष होती है। कर्नल की सेवानिवृत्ति आयु 54 वर्ष होती है। यानी अब पुरोहित को दो साल और देश सेवा का अवसर मिलेगा।

क्या था पूरा मामला

पुरोहित का मामला साधारण नहीं था।

2008: मालेगांव विस्फोट मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई

9 साल उन्होंने जेल में बिताए

फिर उच्चतम न्यायालय से जमानत मिली

जुलाई 2025: विशेष अदालत ने उन्हें सबूतों के अभाव में पूरी तरह बरी कर दिया

यह फैसला केवल कानूनी राहत नहीं था, बल्कि उनके पूरे जीवन और करियर को वापस पटरी पर लाने वाला मोड़ था।

बेदाग रहा है सेवा रिकॉर्ड

सेना में उनकी सेवा रिकॉर्ड पर नजर डालें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है।

20 साल से अधिक का बेदाग करियर

आतंकवाद विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका

उत्कृष्ट सेवा मूल्यांकन रिपोर्ट

इसके बावजूद उनकी पदोन्नति इसलिए रुक गई क्योंकि वह एक लंबी कानूनी प्रक्रिया में फंसे रहे। उनके जूनियर अधिकारी ब्रिगेडियर बन गए, जबकि उनका करियर ठहर गया। आखिरकार उनकी आवाज सुनी गई।

सैम मानेकशा के बाद ऐसा सम्मान पाने वाले दूसरे अधिकारी बने

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पुरोहित उन गिने-चुने अधिकारियों में शामिल हो गए हैं जिन्हें बिना कर्नल स्तर पर यूनिट कमांड किए सीधे ब्रिगेडियर बनाया गया है। सेना के इतिहास में इससे पहले यह उपलब्धि केवल महान सैन्य अधिकारी और पूर्व सेनाध्यक्ष सैम मानेकशा को मिली थी। यह तुलना अपने आप में बताती है कि पुरोहित का मामला कितना असाधारण है।

क्या संदेश देता है यह फैसला

यह निर्णय केवल एक व्यक्ति के सम्मान की बहाली नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक संदेश है कि अगर कोई निर्दोष है तो देर से ही सही, उसे न्याय जरूर मिलेगा। सेना ने यह दिखा दिया है कि वह अपने अधिकारियों के साथ खड़ी रहती है, खासकर तब जब वह परिस्थितियों के कारण पीछे रह जाते हैं।

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प्रेरणा की कहानी

पुरोहित का संघर्ष हमें यह भी सिखाता है कि धैर्य और विश्वास कितना जरूरी है। एक अधिकारी जिसने जेल देखी, आरोप झेले, करियर लगभग खत्म होता दिखा, वही आज ब्रिगेडियर बनकर सामने खड़ा है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो मुश्किल हालात में भी हार नहीं मानता।

भारतीय सेना के इस फैसले की जितनी सराहना की जाए कम है। यह कदम केवल पुरोहित के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। यह दिखाता है कि सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता और न्याय को रोका नहीं जा सकता।

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