Kaisa Naya Varsh Hindi Poem

न मौसम बदला,
न बदला उसका मिजाज।
फिर कहां से आती है,
वर्ष बदलने की आवाज?

घने कोहरे में कांपता सूरज,
कल भी था, आज भी है।
तीखी ठंड हवाओं से,
दुबके परिंदे, पेड़ों पर,
कल भी थे, आज भी हैं।

ओस से नहाए खेत,
ठिठुरती मड़ई और पेट।
जमते खून को रवां करने,
की कोशिश।
सर पर गमछे का कसाव,
दालान में जलता अलाव,
कल भी था आज भी है।

फिर किस बात का हर्ष है,
कैसा नया वर्ष है?


जब आम पे बौरें खिलने लगें,
खेतों में सरसों मचलने लगें,
बागों में कोयल कुहुकने लगें,
महुआ की कूंचे टपकने लगें।
सुवासित बसंती बहने लगे,
अंगड़ाई ले बदन फड़कने लगे,
तब मानो नया उत्कर्ष है,
वही नया वर्ष है।

ऐसी रौनक लिए चैत्र आता है,
नए साल के नए परिवेश का,
असली अर्थ बताता है।

– अरविंद त्रिपाठी

इसे भी पढ़ें: नए साल में क्या हों भारत के सपने

इसे भी पढ़ें: जब जाना तय है तो जाओ

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया NEWS CHUSKI के Facebook पेज को LikeTwitterInstagram पर Follow करना न भूलें...