अरबिन्द शर्मा अजनवी
अरबिन्द शर्मा अजनवी

चाह थी की मैं तुम्हारे।
नैन का अंजन बनूँ।।
लालिमा अधरों की तेरे।
मांग मध्य सिंदूर बनूं।।

कुसमाकर के तरूपल्लव सा।
मैं तेरा सिंगार बनूं।।
अद्भुत रूप धरूं उपवन में।
बन बसंतऋतू मैं चहकूं।।

कान कुन्डल हाथ कंगन।
बिंदीया बन माथे चमकू।।
हार गले का बनूं तुम्हारे।
गजरा बन कर मैं महकूं।।

सिंगार करो मैं दर्पण बन।
हर समय तुम्हारे पास रहूं।।
छाया बन तेरे जीवन की।
अदृश्य रूप में पास रहूं।।

पर, चाह जो थी दिल में मेरे।
दफ़्न दिल में हो गई।।
याद अवलम्बन बना।
क़िस्मत मिलन की सो गयी।।

बिलख रहा है मन पपिहरा।
बूंद स्वाती का मिले।।
तेरी याद वर्षा बने औ।
आ मेरे मुख में गिरे।।

अब छिप रहा है बदलियों में।
चांद मेरे इश्क़ का।।
शहर की गलियों में तनहा।
चांद को हूं ढूंढता।।

थक गये! अब पांव मेरे।
पथ भी दू-भर हो गये।।
याद की धड़कन लिये अब।
सांस मेरे थम रहे।।

अतृप्त रहा जीवन मेरा।
तृप्त मुझे कर जाना तुम।।
अंतिम सफ़र करूं जीवन का।
पास मेरे आ जाना तुम।।

सदा प्रसन्न रहे तू जग में।
चाह रही यह जीवन भर।।
अश्रु न हो नयनों में तेरे।
दीदार करो जब अंतिम क्षण।।

अंतिम इच्छा जीवन की है।
मांग रहा याचक बन कर।।
गंगा जल में याद तुम्हारी।
अंतिम क्षण हो अधरों पर।।

स्पर्श मुझे तुम कर लेना।
इक बचन लिए अपने मन में।।
राज हमेशा राज रहे हम।
मिल न सके इस जीवन में।।

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