जानें अक्षय तृतीया कब, इन उपायों को करने से मिलते हैं पुण्यफल

0
215

लखनऊ। अक्षय तृतीय त्योहार को अक्ती या आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार हिन्दुओं व जैनियों का एक शुभ त्योहार है। इस साल यह तिथि 14 मई को पड़ रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया मनाई जाती है। सनातन धर्म में अक्षय तृतीया बहुत ही शुभ दिवस माना जाता है। इस दिन अबूझ मुहूर्त होने के कारण किसी भी तरह के शुभ कार्य किये जा सकते हैं। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन दान का दोगुना फल मिलता है। इसके साथ ही इस दिन सोना खरीदना भी बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।

दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥

अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है। ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।

अक्षय तृतीया का महत्व

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मपाज युधिष्ठिर को अक्षय तृतीया का महत्व बताते हुए कहा था कि यह परम पुण्यमयी तिथि है। इस दिन दोपहर से पहले स्नान, दान और तप करने से इंसान को पुण्यफल की प्राप्ति होती है। अक्षय तृतीया को एक लेकर प्रचलित एक पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक गरीब और वैश्य रहता था। जिसकी देवताओं में ज्यादा श्रद्धा थी। गरीब होने के कारण वह बहुत व्याकुल रहता था। इस दिन उसे किसी से अक्षय तृतीया व्रत के बारे में पता चला। उसनें इस दिन विधि-विधान से देवी-देवताओं की पूजा की और दान-पुण्य किए। इस दिन किए गए दान-पुण्य के प्रभाव से वह अगले जन्म में कुशावती का राजा बना।

अक्षय तृतीया व्रत व पूजन विधि

  1. इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए की वह सुबह स्नानादि से शुद्ध होकर पीले वस्त्र धारण करें।
  2.  अपने घर के मंदिर में विष्णु जी को गंगाजल से शुद्ध करके तुलसी, पीले फूलों की माला या पीले पुष्प अर्पित करें।
  3.  फिर धूप-अगरबत्ती, ज्योत जलाकर पीले आसन पर बैठकर विष्णु जी से सम्बंधित पाठ (विष्णु सहस्त्रनाम, विष्णु चालीसा) पढ़ने के बाद अंत में विष्णु जी की आरती पढ़ें।
  4.  साथ ही इस दिन विष्णु जी के नाम से गरीबों को खिलाना या दान देना अत्यंत पुण्य-फलदायी होता है।
  5. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन नर-नारायण, परशुराम व हयग्रीव अवतार हुए थे। इसलिए मान्यतानुसार कुछ लोग नर-नारायण, परशुराम व हयग्रीव जी के लिए जौ या गेहूँ का सत्तू, कोमल ककड़ी व भीगी चने की दाल भोग के रूप में अर्पित करते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन क्‍या करें

  • अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है।
  • नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है।
  • ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है।
  • मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए।
  • गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है।
  • यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है।
  • इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन–जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

जैन धर्म में महत्‍व

जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी–गन्ने) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते–करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here