तीसरा पदक दिलाने के बाद लवलीना ने बोली दिल छू लेने वाली बात

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टोक्यो। ओलंपिक के 69 किग्रा भार वर्ग मुकाबले के सेमीफाइनल में भारतीय महिला मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन ने बुधवार को तुर्की की बुसेनाज सुरमेनेली के हाथों 0-5 से हार का सामना कर कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा है। इसके साथ ही असम की मुक्केबाज लवलीना का फाइनल में जाने का सपना चकनाचूर हो गया। लवलीना के कांस्य जीतने के साथ ही भारत ने टोक्यो ओलंपिक में अपना तीसरा पदक हासिल कर लिया है। भारत ओलम्पिक में अब तक एक रजत व दो कांस्यपदक ही हासिल कर पाया है। लवलीना से पहले भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने रजत और बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने महिला एकल वर्ग में भारत को कांस्य पदक दिलाया है। लवलीना की हार के साथ ही भारत का टोक्यो ओलंपिक में मुक्केबाजी मुकाबले में सफर समाप्त हो गया है। कांस्य पदक जीतने के बाद लवलीना ने कहा, बोरगोहेन ने मुकाबले के बाद कहा कि अच्छा तो नहीं लग रहा है। मैंने स्वर्ण पदक के लिए मेहनत की थी तो यह निराशाजनक है। उन्होंने कहा कि मैं अपनी रणनीति पर अमल नहीं कर सकी। वह काफी ताकतवर थी। मुझे लगा कि बैकफुट पर खेलने से चोट लगेगी तो मैं आक्रामक हो गई लेकिन इसका फायदा नहीं मिला। उन्होंने कहा कि मैं उसके आत्मविश्वास पर प्रहार करना चाहती थी लेकिन हुआ नहीं। वह काफी चुस्त थी। विजेंदर सिंह (2008) और एमसी मैरीकॉम (2012) के बाद ओलंपिक पदक जीतने वाली तीसरी भारतीय मुक्केबाज बनी लवलीना ने कहा कि मैं हमेशा से ओलंपिक में पदक जीतना चाहती थी। मुझे खुशी है कि पदक मिला लेकिन इससे अधिक मिल सकता था।

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उन्होंने कहा कि मैंने इस पदक के लिए 8 साल तक मेहनत की है। मैं घर से दूर रही, परिवार से दूर रही और मनपसंद खाना नहीं खाया। लेकिन मुझे नहीं लगता कि किसी को ऐसा करना चाहिए। मुझे लगता था कि कुछ भी गलत करूंगी तो खेल पर असर पड़ेगा। 9 साल पहले मुक्केबाजी में करियर शुरू करने वाली लवलीना 2 बार विश्व चैम्पियनशिप कांस्य भी जीत चुकी हैं। उनके लिए ओलंपिक की तैयारी आसान नहीं थी, क्योंकि कोरोना संक्रमण के कारण वह अभ्यास के लिए यूरोप नहीं जा सकी। इसके अलावा उनकी मां की तबीयत खराब थी और पिछले साल उनका किडनी प्रत्यारोपण हुआ, जब लवलीना दिल्ली में राष्ट्रीय शिविर में थीं।

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लवलीना ने कहा कि मैं 1 महीने या ज्यादा का ब्रेक लूंगी। मैं मुक्केबाजी करने के बाद से कभी छुट्टी पर नहीं गई। अभी तय नहीं किया है कि कहां जाऊंगी लेकिन मैं छुट्टी लूंगी। यह पदक उनके ही लिए नहीं बल्कि असम के गोलाघाट में उनके गांव के लिए भी जीवन बदलने वाला रहा, क्योंकि अब बारो मुखिया गांव तक पक्की सड़क बनाई जा रही है। इस बारे में बताने पर उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि सड़क बन रही है और मैं जब घर लौटूंगी तो अच्छा लगेगा।

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