‘गांधी: एक पुनर्विचार’ पर राष्ट्रवादी लेखक संघ की साहित्यिक वैचारिकी!

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लखनऊ: राष्ट्रवादी लेखक संघ के तत्वावधान में गांधी पर एक साहित्य वैचारिकी का आयोजन किया गया जिसमें देश-विदेश से वक्ता और लेखक जुड़े। ‘गांधी: एक पुनर्विचार’ कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए लंदन के नीलेश जोशी ने कहा कि गांधी-मत में प्रमुखता पाने वाले सत्य और अहिंसा का विचार यों तो अच्छा है, लेकिन क्या भेड़िए के समक्ष भी हम अहिंसक ही रहेंगे? अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई केवल अहिंसा के बल पर नहीं जीती जा सकती थी। देश की आजादी के लिए नेताजी के नेतृत्व मे लड़ते हुए आजाद हिंद फौज के 26 हजार से अधिक सैनिक बलिदान हो गए थे। ऐसे मे देश को आजादी दिलाने का क्रेडिट नेताजी को भी उतना ही मिलनी चाहिए। प्रथम विश्व युद्ध में गांधी के समर्थन से कुल 9 लाख भारतीय अंग्रेजों की तरफ से लड़े थे, जिसमें लगभग 48000 सैनिक शहीद और 50,000 से अधिक सैनिक घायल हुए थे। गांधी अगर राष्ट्रवादी और अहिंसावादी थे, तो देशवासियों को शहीद होने के लिए लड़ने क्यों भेज दिया?

गंगा महासभा केगोविंद शर्मा ने कहा कि गांधी प्रैक्टिसिंग हिंदू थे। शुद्ध शाकाहारी, व्रतधारी, पूजाकर्ता, गीतापाठी और वर्णाश्रम  पालक व्यक्ति थे। देश के बंटवारे के दौरान जितनी भी गलतियां हुई, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि सारी गलतियां गांधी की ही देन है। जिन लोगों ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए, वे सभी जिम्मेदार है। यह सत्य है कि गांधी हमें विभाजित भारत दे गए, जनसंख्या के संतुलन को बिगड़ने दिया, लेकिन सोचने की बात है कि हम एक नागरिक के रूप में अखंड भारत के लिए क्या कर रहे हैं? सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए हम कितने संकल्पित हैं। अब कोई दूसरा बटवारा ना हो, इसके लिए हम किस तरह की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, इस पर भी विचार करना होगा।

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युवा अधिवक्ता कौस्तुभ त्रिपाठी ने कहा कि गांधी को आज ऐसा स्थान हासिल हो चुका है कि उनकी शान में गुस्ताखी करने की जुर्रत नही होती। अब जरूरत इस बात की है कि नए परिवेश में गांधी और उनकी विचारधारा को नए सिरे से परखा जाय कि क्या वास्तव में देश के हीरा अकेले वही थे? क्या केवल गांधी के दम पर ही देश को आजादी मिल पाई? उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाए तो गांधी एक असफल पुत्र, असफल पिता और असफल पति रहे हैं, फिर  आजादी की लड़ाई में कैसे सफल हो गये?

देश के लिए गांधी के योगदान की जहां तक बात है, उन्होंने भारत लौटने के बाद एक भी क्रांतिकारी और सेनानी के पक्ष में मुकदमा नहीं लड़ा, क्यों? मात्र एक केस लिया भी था लेकिन उसे भी पूरा नहीं लड़ा? गांधी द्वारा स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे को भाई कहना और उसे सही ठहराना तथा श्रद्धानंद के समर्थन में एक शब्द नहीं बोलना गांधी की राष्ट्रभक्ति पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। बंटवारे के बाद देश छोड़ने वाले मुस्लिमों की संपत्ति पर उनके मालिकाना हक और मुस्लिमों की सुरक्षा का दबाव बनाने वाले गांधी सरहद-पार हिंदुओं के कत्लेआम पर चुप रहे। तो क्या ईश्वर अल्लाह तेरो नाम कहना एक नाटकमात्र था? उन्होंने बल दिया कि प्रत्येक प्रयोग का कोई न कोई परिणाम निकलता है।

गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का परिणाम भी सामने आना चाहिए। संस्थापक न्यासी आदित्य विक्रम श्रीवास्तव ने कहा कि सत्य और अहिंसा का आज भी कोई विकल्प नहीं है, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि गांधीजी का सत्य वस्तुतः क्या था? उनकी अहिंसा किस तरह की थी? सन  1915 में  अफ्रीका से भारत लौटने पर कांग्रेस गरम दल के अवसान के नाते उन्हें उभरने का मौका मिल गया तो उन्होंने  असहयोग आंदोलन छेड़ दिया, लेकिन यह असहयोग आंदोलन भारत की आजादी के लिए नहीं, दर असल तुर्की के खलीफाओं के समर्थन में था, जिसे खिलाफत आंदोलन नाम दिया गया। लेकिन जब उन्हें पता चला कि आंदोलन का नेतृत्व राष्ट्रवादियो के हाथ में जा रहा है, तब पता नहीं किसके दबाव में आकर उन्होंने असहयोग आंदोलन को अचानक बीच में ही रोक दिया।

उनके इस तुष्टिपरक फैसले से कांग्रेस के अंदर और बाहर भी असंतोष फैल गया। उन्होंने कहा कि देश के बंटवारे के फलस्वरुप ₹55 करोड़ पाकिस्तान को देने के लिए गांधीजी का अनशन पर बैठना, जामा मस्जिद प्रकरण पर मुस्लिमों का पक्ष लेना, पाकिस्तान के पूर्वी और पश्चिमी भाग को जोड़ने वाला गलियारा भारत के बीचो बीच से देने के लिए जिद करना, और तो और, इस्लाम व तलवार के बीच के संबंध को प्रतिकूल परिस्थितियों  की देन मानना गांधी के मुस्लिम तुष्टिकरण का अकाट्य प्रमाण है। इस तरह की मानसिकता के व्यक्ति को पंथनिरपेक्ष भारत  का पिता कहा जाना कहाँ तक संगत है।

‘गांधी: एक पुनर्विचार’ शीर्षक से संपन्न साहित्य वैचारिकी में तमाम विद्वानों के बीच विषय प्रवेश करते हुए राष्ट्रवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव श्री अनूप नवोदय ने कहा कि गांधी के प्रयोग में आया सत्य और अहिंसा तो वास्तव में जीवन का अंग, बुद्ध का पथ, शांति की दिशा है, लेकिन 1906 मैं जुलू विद्रोह को अंग्रेजों ने बलपूर्वक दबाया तब गांधी जी अंग्रेजी सेना में सार्जेंट के रूप में कार्य कर रहे थे। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में भी देशवासियों के विरोध के बावजूद गांधी अंग्रेजों के पाले में खड़े हो गए और भारतीयों को अंग्रेजों की तरफ से युद्ध में लड़ने के लिए कहने लगे। गांधी का यह दोहरा आचरण कहीं न कहीं उनकी भूमिका पर पुनर्विचार करने को उद्यत करता है।

राष्ट्रवादी लेखक संघ के अध्यक्ष कमलेश कमल की अध्यक्षता में संपन्न इस गोष्ठी में पूर्व राजभाषा अधिकारी राजेश्वर उनियाल ने बड़े तर्कपूर्ण शब्दों में गांधी के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की सफलता पर संस्थापक न्यासी अखिलेश्वर मिश्र, रघुनाथ पाण्डेय, भावेश जाधव, कुणिक तोमर, अन्वेष सहित देश भर के राष्ट्रवादी लेखकों ने बधाई प्रेषित की।

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