क्या आप नवरात्रि साधना के लिए तैयार हैं?

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Kamlesh Kamal
कमलेश कमल

दुर्गोत्सव आरंभ होने को है। इससे जुड़ी तमाम उद्भावनाओं, स्थापनाओं एवं अवधारणाओं के बीच यह प्रश्न विद्यमान है कि क्या हम सच ही जागरण के लिए तैयार हैं? आइए कुछ विचार करें। क्या माता का जगराता (जागरण की रात्रि का अपभ्रंश) कर आप भी माता को जगाने वाले हैं? अवश्य करें। पर यह ध्यान रहे कि माता आदि शक्ति है जो हम सबके अंदर है, उस शक्ति का अर्थात् अपना जागरण करना है।

दस दिन बाद जब हम विजयादशमी मना रहे होंगे, तो शब्दों की कम समझ रखने वाले भोले-भाले आम जनों की तरह आप भी इसे किसी घटना या किसी चीज के उपलक्ष्य में मना कर इतिश्री कर लेंगे, या इसे समझेंगे कि यह दुर्गोत्सव हमारे अपने ही दुर्ग पर विजय का उत्सव है?

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तो, अगर जीत गए, स्वयं से ही जीत गए, स्वयं का ही जागरण हो गया तभी विजयादशमी सार्थक है। जिस पराम्बा, चिन्मात्र, अप्रमेय, निराकार, मंगलरूपा, आराधिता, मोक्षदा, सर्वपूजिता, सर्व सिद्धिदात्री, नारायणी शक्ति की हम आराधना करते हैं, वे हमारे अंदर ही अवस्थित हैं। इसे समझकर ही हम अपनी संकल्पित इच्छाशक्ति से उस शिवा (शिव या कल्याण को उपलब्ध कराने वाली) को महसूस कर आगे बढ़ सकेंगे, अपनी ही वासनाओं, इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर सकेंगे जिससे कि कर्म के बंधन कटेंगे।

700 श्लोकों से युक्त दुर्गा सप्तशती के पाठ को हम आँख और दिमाग दोनों खोल कर पढ़ें, इनसे जुड़ी पूजा-पाठ की पद्धतियों को वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसने की कोशिश करें!

जब हम आचमण करें- “गंगे च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदा सिंधु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु” पढ़ते समय यह ध्यान हो कि ये पवित्र नदियों के नाम हैं जिनसे हमारी आस्था जुड़ी है, जो हमारे संस्कार में हैं। हम इनका पवित्र जल अत्यंत अल्प मात्रा में पी रहे हैं। यह भी ध्यान रहे कि आचमन में चम् धातु है जिसमें पीना और गायब होना दोनों शामिल है। अस्तु, यह जल इतना ज्यादा नहीं है कि आंतों तक जाए। यह हृदय के पास ज्ञान चक्र जाते-जाते गायब हो जाता है, अर्थात् यह ज्ञान की तैयारी का प्रतीक है।

जब अर्घ्य दें तो पता हो कि जो अर्घ के योग्य है, वही अर्घ्य (अर्घ् +यत्) है… या जो बहुमूल्य है और देने के योग्य है वही अर्घ्य है। तो, पूजा-पाठ की सामग्री के साथ अपने मन के आदर और श्रद्धाभाव को भी मिलाएँ जिससे वह देने योग्य हो जाए।

जब हम संकल्प करें तो तो अपनी वासनाओं, बुराइयों पर विजय का संकल्प करें। जब हम शुद्धि करें (कर शुद्धि, पुष्प शुद्धि, मूर्ति एवं पूजाद्रव्य शुद्धि, मंत्र सिद्धि शरीर-मन की शुद्धि) तो यह ख्याल रहे कि यह साधना है, कोई आडंबर नहीं।

तदुपरांत दिव्या: कवचम्, अर्गलास्तोत्रम्, कीलकम्, वेदोक्तं रात्रिसूक्तम् से लेकर त्रयोदश अध्याय तक पाठ करते समय हमें शब्दों के महत्व पर विचार अवश्य कर लेना चाहिए यथा कवच अपने सदविचारों और संकल्प का है, और जो हम पढ़ रहे हैं, उसका कुछ ऐसा ही प्रतीकात्मक अर्थ है।

अंत में क्षमा प्रार्थना, श्रीदुर्गा मानस पूजा, सिद्ध कुंजिकास्तोत्रम्, आरती आदि के पाठ के समय हर समय यह ध्यान रहे कि हमें अपनी ही आंतरिक शक्ति को जगाना है, अपने ही सत्त्व, रज और तम वाली त्रिगुणात्मक प्रकृति पर विजय पाना है, किसी बाहरी व्यक्ति या वस्तु पर नहीं।

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अगर हम ऐसा कर सके तो हमारी यह शक्ति नित्या (“जो नित्य हो, विनष्ट न हो) सत्या (सत्यरूपा) और शिवा (सर्वसिद्धिदात्री) हो जाएगी और हम पुलकित भाव से अपनी साधना को फलीभूत होते देख सकेंगे और हमारा सर्वविध अभ्युदय हो सकेगा-

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्ग:।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भगवती प्रसन्ना।।

(लेखक साहित्यकार हैं)
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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