मां गंगा ने नरेंद्र मोदी को चुना और मोदी ने चुना योगी आदित्यनाथ को

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Narendra Modi & Yogi Adityanath
Sanjay Tiwari
संजय तिवारी

राष्ट्रीय राजनीति में काशी से नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) का उद्घोष याद कीजिये। उन्होंने कहा था- न मैं लाया गया हूँ, न किसी ने मुझे भेजा है। माँ गंगा (maa Ganga) ने मुझे बुलाया है। नरेंद्र मोदी के इस उद्घोष को देश के कथित विद्वान और कथित पंडित समझ ही नहीं पाए। अयोध्या, काशी और मथुरा में मलेछों के बंदी गृहों में मुक्ति के लिए आतुर बालरूप श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान विश्वेश्वर की प्रतीक्षा समाप्त हो रही है। सनातन के उद्भव का नया भारत, नई पृथ्वी, नई चेतना प्रवाह पा चुकी है और मां गंगा के संकल्प से सनातन के महायोद्धा मोदी ने आदिदेव, नाथ योगी, भगवान विश्वनाथ की कृपा और संकेत पाकर सनातन स्थापना के इस महासमर में चुन लिया योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) को। आध्यात्मिक चुनाव था यह।

यह अलग बात है कि इस आध्यात्मिक सनातन प्रवाह की स्थापना के रण में रजानीतिक शक्ति और मार्ग भी चाहिए था। मोदी गुजरात से निकल चुके थे। बाबा सोमनाथ की पावन धराधाम और मां अम्बे के आशीर्वाद ने उन्हें काशी में बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा की शरण में शक्ति दे दी। वहीं का संकेत था। गुरु गोरक्षनाथ की तपस्थली में तप रहे युवा संन्यासी की भावचेतना से परम दिव्य समस्त शक्तियों का संयोग बना। जो लोग वर्ष 2017 को केवल रजानीतिक नजरिये से देख रहे थे, उन्हें अब संज्ञान लेना चाहिए। वर्ष 2014 से लगातार सनातन के युद्ध की बात मैंने की है और इस युद्ध को आगे बढ़ते और इसके परिणाम को भी देख रहा हूँ।

नरेंद्र मोदी लोगों के लिए राजनेता ही हैं, लेकिन मुझे उनमें केवल एक सनातन आदि तपस्वी दिखा है। वर्ष 2014 में 16 मई के दिन ही काशी में नरेंद्र मोदी को रजानीतिक विजय मिली थी। ठीक आठवें वर्ष 16 मई, 2022 को ही ज्ञानवापी परिसर से परमपवित्र भगवान विशेश्वर महादेव का प्राकट्य दिखा। यह केवल संयोग ही नहीं है। इसी बीच श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा के मामले को भी न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है।

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तात्पर्य यह कि ये सभी घटनाक्रम उत्तरप्रदेश में हो रहे हैं। सनातन जीवन संस्कृति के केंद्र इस प्रदेश को नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व देकर अनेक संकेत दे दिए हैं जिनके बारे में रजानीतिक पंडित और कथित जानकार कुछ भी नहीं समझ पा रहे। नरेंद्र मोदी जिस युद्ध मैदान में हैं वहां वैश्विक और राष्ट्रीय राजनीति भी है और आध्यात्मिक सांस्कृतिक और सभ्यता का महा युद्ध भी। ऐसी परिस्थिति में किसी भी चक्रवर्ती सम्राट को एक साथ कई मोर्चों पर सोचना, समझना और कार्य करना होता है। उत्तर प्रदेश वैसे तो भारत का एक राज्य है, लेकिन जनसंख्या और अन्य मामलों में यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा राष्ट्र जैसा है। यहां काशी भी है। मथुरा भी है। अयोध्या भी है। प्रयाग भी है। कपिलबस्तु और कुशीनगर भी है।

विश्व मे जितनी बड़ी संख्या हिन्दू समुदाय की है उससे भी बड़ी संख्या बौद्ध देशों और बौद्ध समुदाय की है। जैन समाज का केंद्र पवानागर भी यहीं है जिसे अभी लोग फाजिलनगर के नाम से जानते हैं । वास्तविक पावा पर भी अभी कार्य हो रहा है । ऐसे में उत्तर प्रदेश को केवल राजनीति से नहीं संचालित किया जा सकता। यहां राजनीति से ज्यादा आस्था और विश्वास की आवश्यकता पड़ती है। आस्था ही हमारी श्रद्धा है।

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गोस्वामी जी ने श्री रामचरित मानस के प्रारंभ में ही लिखा है- भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।। भवानी की शक्ति और शिव का विश्वास अर्जित किये बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं। ऐसे में यदि हमारे चक्रवर्ती सम्राट ने उत्तर प्रदेश यानी श्रीहरि के अवतरण के स्थल की सुरक्षा और संरक्षा की जिम्मेदारी के लिए एक योगी को चुना है तो इसको दैव योग ही मानिए। पृथ्वी का इतिहास साक्षी है। जब जब पृथ्वी पर गो, गंगा, गायत्री और संत ब्राह्मण संकट में पड़े हैं तो भीषण युद्ध हुआ है। यह युद्ध केवल मनुष्य नही लड़ते। मनुष्य के रूप में धरती पर विधर्म का प्रसार करने वाले और मनुष्यों पर अत्याचार करने वाले असुर प्रवृत्तियों से संघर्ष में हमेशा मनुष्यता की विजय हुई है। सनातन सत्य है यह। इसीलिए इस बार भी इस महायुद्ध में सनातन का जीत जाना सुनिश्चित है। यह महायुद्ध 2014 से शुरू हो चुका है।

क्रमशः

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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