शासन के तुगलकी फरमान के खिलाफ बड़े आंदोलन की ओर स्वास्थ्य विभाग

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Dr. Amit Singh & Ashok Kumar
डॉ. अमित सिंह अध्यक्ष और अशोक कुमार प्रधान महासचिव चिकित्सा स्वास्थ्य महासंघ उत्तर प्रदेश

अरविंद कांत त्रिपाठी

लखनऊ: अस्पतालों में वेंटिलेटर, आक्सीजन सिलेंडर, बेड और चिकित्साकर्मियों की कमी, उखड़ती साँसों को रोकने के खातिर एक अदद बेड पाने को तरसते लोग, सन्नाटों में डूबी बियावान सड़कों के दहशत भरे सन्नाटे को रह-रह कर चीरती एम्बुलेंस की आवाजें, अस्पतालों में भयानक आपाधापी, 90-95 मरीजों के बीच दौड़ते, भागते सिर्फ दो स्टाफ, उस अनियंत्रित स्थिति को संभालने की अकथ्य मशक्कत, असमय लोगों की टूटती सांसे, सफेद मजबूत पालीथिन में लिपटकर श्मशान व कब्रिस्तान को जाती लाशों का रेला, दाह के लिए कम पड़ चुकी लकड़ियों की खबरें… आदि सब कुछ मनहूस आघात अभी दिल-दिमाग में जिंदा है ताजा है। क्योंकि अभी तो मुआवजा लेने, देने का सिलसिला जारी है। अभी दसवां में बनावाए गए बाल ठीक से नहीं उगे हैं। अभी चालीसवाँ का गम ठीक से नहीं गुजरा है।

अभी काल बनकर टूट पड़ने वाला कोरोना गया कहां है? अभी तो उसके डेल्टा वैरिएंट की भयावह भविष्यवाणियां कानों को छेद रही हैं। अभी नौनिहालों (बच्चों) को कोविड से बचाने के लिए अस्पताल तैयार किए जा रहे हैं। कोरोना मरीजों के संयमित और व्यवस्थित इलाज के लिए बड़ी मशक्कत के बाद अभी-अभी तो अस्पतालों में टीमें खड़ी हो पाई हैं। इस नई महामारी के इलाज में चिकित्साकर्मियों को अपनी निश्चित-भूमिका का ज्ञान हो पाया है। कौन सी मशक्कत? क्या मशक्कत? इन सवालों का सही जवाब तांडव मचा रहे कोरोना काल (पिछले अप्रैल-मई माह) में अस्पतालों में डटे बदहवास डाक्टर व कर्मचारी दे सकते हैं, उस जलजले से दूर अपने वातानुकूलित कक्षों में बैठ कर फरमान जारी करने का कोरम पूरा करने वाले बड़े अधिकारी नहीं।

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सही जवाब वह चिकित्साकर्मी दे सकते हैं जो मरीजों के इलाज में खुद संक्रमित होकर मौत के मुंहाने तक चले गए। सही जवाब घर के एक मात्र कमाऊ उस चिकित्साकर्मी के घर वाले दे सकते हैं जो सेवा के दौरान कोरोना की चपेट में आकर दुनिया से चला गया। सही उत्तर उन सारी महिला कर्मियों के पास है जिन्हें अपने घर में संक्रमित पड़े माँ, बाप, पति, पुत्र-पुत्री आदि को छोड़कर ड्यूटी पर आना होता था। बिना सांस लिए आठ घण्टे की सेवा की घोर थकान लिए घर जाकर घर के रोगियों की सेवा और चूल्हा-चाकी, कुछ घण्टे की नींद के बाद फिर भागकर अस्पताल आना था। उस व्यवस्था में भी सही उत्तर मिल जाएगा, जिसमें कोरोना मरीजों के संक्रमण बीच सेवा करने वाले कर्मी संक्रमण को अपने घर तक ले जाने की संभावनाओं के साथ सीधे अब अपने घर जाते थे।

ध्यान रहे कोरोना की पहली लहर में चिकित्सा कर्मियों को 14 दिन की सेवा के बाद किसी अलग व सुरिक्षत स्थान पर 14 दिन कोरंटाइन रहने का विधान था। फरमान जारी करने वाले अधिकारियों ने अबकी बार उस व्यवस्था को जरूरी नहीं माना था। यहां तक कि जानकारी के अनुसार, अब कर्मचारी कर्मचारी रोज ड्यूटी करके रोज अस्पताल से घर जाना और खुद कोरोना की चपेट में आने पर महज सात दिन में ही पूण: ड्यूटी पर आना अनिवार्य था। वरना सेवा और सैलरी पर संकट! इन मशक्कत भरी व्यवस्थाओं के साथ गुजरी है दूसरी लहर।

बहरहाल अस्पतालों में अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में प्रशिक्षित डाक्टर व पैरा-मेडिकल्स की टीम खड़ी हो चुकी है। ऐसे में इसी समय, प्रदेशभर के पैरा-मेडिकल कर्मियों को स्थानांतरण के नाम पर तितर-बितर कर देना, बड़ी कठिनाई से तैयार टीमों को तोड़कर यहां-वहां कर देना किस तरह जनता के हित में है?
स्थानांतरण नीति है, होना चाहिए लेकिन जिस समय आपदा सर पर कोहराम मचाने को तैयार हो, कोविड की भयानक लहर आने की भविष्यवाणियां हों ऐसे में रास्ते पर आ चुकी व्यवस्था को छेड़ना, जानकारों के अनुसार खतरे को और गम्भीर करने जैसा है।

उधर 15 जुलाई तक स्थानांतरण सूची जारी कर देने के शासन के फरमान से प्रभावित प्रदेश भर के सरकारी अस्‍पतालों के पैरा-मेडिकल्स (चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के पीएमएस संवर्ग, नर्सिंग संवर्ग, पैरामेडिकल संवर्ग व अन्य समस्त संवर्ग के अधिकारियों-कर्मचारियों) 9 जुलाई से दो घंटे कार्य बहिष्‍कार का ऐलान कर चुके हैं। आंदोलन की चेतावनी देने वाले चिकित्सा स्वास्थ्य महासंघ उत्तर प्रदेश ने इस वर्ष नीतिगत स्थानांतरण को टालने व व्यक्तिगत अनुरोध पर स्थानांतरण करने की मांग की है। महासंघ के प्रधान महासचिव अशोक कुमार की ओर से चिकित्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के महानिदेशक को सौपे गए पत्र में कहा गया है कि महासंघ के संज्ञान में आया है कि महानिदेशालय द्वारा स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारियों के व्यापक स्तर पर स्थानांतरण करने की तैयारी की जा रही है।

इन्हीं अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने अपनी जान व हितों को ताख पर रखते हुए सरकार के निर्देशों पर प्रदेश की जनता को कोविड-19 संक्रमण से मुक्त कराने के लिए रात-दिन कार्य किया है। विभाग के लगभग 90% अधिकारी एवं कर्मचारी ड्यूटी करते हुए कोविड से संक्रमित हुए साथ ही उनके परिवार के सदस्य भी संक्रमित हुए। प्रदेश में सेवा के दौरान सैकड़ों अधिकारी-कर्मचारी व उनके परिवारिकजन संक्रमित होने के कारण दिवंगत हुए। वर्तमान में भी सैकड़ों अधिकारी एवं कर्मचारी पोस्ट कोविड लक्षणों से जूझ रहे हैं। ऐसे में विभाग में व्यापक स्तर पर स्थानांतरण किया जाना उचित नहीं है यह कर्मचारियों को उत्साहित करने की जगह दण्डित करने का निर्णय है।

पत्र में अशोक कुमार ने प्रदेश में कोविड 19 महामारी की तीसरी लहर को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के पीएमएस संवर्ग, नर्सिंग संवर्ग, पैरामेडिकल संवर्ग एवं अन्य समस्त संवर्ग के अधिकारियों कर्मचारियों के वर्तमान स्थानांतरण सत्र को स्थगित करने का अनुरोध किया है। मांग न माने जाने पर चिकित्सा स्वास्थ्य महासंघ उत्तर प्रदेश से सम्‍बद्ध समस्त संगठनों ने प्रदेश भर में आंदोलन करने की तैयारी की है।

आंदोलन की रूपरेखा बताते हुए कहा गया है कि 9 जुलाई से अनवरत प्रातः आठ बजे से दस बजे तक दो घंटे कार्य बहिष्कार होगा। 12 जुलाई को प्रदेश भर के चिकित्सक व कर्मचारी प्रातः 10 बजे से महानिदेशालय का घेराव करेंगे। इस दौरान अगर कोई भी स्थानांतरण सूची जारी की जाती है तो प्रदेश भर में पूर्णतः कार्य बहिष्कार प्रारंभ हो जाएगा। स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव की जिम्मेदारी महानिदेशालय के उच्च अधिकारियों एवं शासन की होगी। बताया गया है कि संघ ने पत्र की प्रतिलिपि स्वास्थ्य मंत्री, मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव, कार्मिक, अपर मुख्य सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को भी भेजी दी है।

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